गुरु पूर्णिमा: मानवता को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करने वाला पर्व

भारत की सांस्कृतिक विरासत हमें मानवीय मूल्यों से परिचित कराती है तथा ज्ञान और शाश्वत शिक्षा प्रदान करती है। इसका विविध एवं सर्वव्यापी स्वरूप सामूहिक चेतना को जागृत करता है जिसकी अभिव्यक्ति भारत में मनाए जाने वाले विभिन्न त्यौहारों के रूप में होती है। ये त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं हैं बल्कि ये हमारी प्रकृति के साथ जुड़ाव तथा वैज्ञानिक सोच एवं आध्यात्मिक चिंतन से जुड़े हैं। गुरु पूर्णिमा एक ऐसा ही विशेष अवसर है जो हमें इतिहास में घटित घटनाओं के बारे में रूककर विचार करने और उन्हें समझने का अवसर प्रदान करता है। यह हमें यह जानने के लिए प्रोत्साहित करता है कि विगत की परिस्थितियों में अब क्या बदलाव आया है, किन बातों को हम अभी भी अपनाए हुए हैं और हमने अपने पीछे क्या कुछ छोड़ दिया है? हमने व्यक्ति के रूप में कितनी और सामूहिक रूप में कितनी उपलब्धियां हासिल की हैं? अपनाने और छोड़ने के इस दौर में हमारा साथ किन लोगों ने सबसे अधिक दिया? जीवन के उथल-पुथल एवं दुख से भरे समय में जबकि हमारा काफी अधिक पतन हो सकता था वैसे अस्थिर समय में किसने हमारा साथ दिया? ये सभी ऐसे प्रश्न हैं जिनके समाधान के लिए हमें गुरु या एक पथ-प्रदर्शक शक्ति की सर्वाधिक अहम भूमिका होती है चाहे वह कोई व्यक्ति हो, सिद्धांत हो या हमारे अंतर्मन की शक्ति हो जो हमारी जीवन यात्रा के दौरान सर्वाधिक शक्तिशाली मित्र के रूप में हमारा साथ निभाती है। समय की कसौटी पर खरे उतरे वे कौन से सिद्धांत हैं, जो हमें जीवन के पथ पर एक संतुलित यात्री बने रहने में सफल बनाते हैं। हमारे जीवन की इन सभी विविध परिस्थितियों के बीच प्रायः अदृश्य अथवा दृश्य, मूर्त या अमूर्त ऐसी शक्तियां होती हैं चाहे वो किसी पथ-प्रदर्शक का हाथ हो या कोई दिव्य विचार हो, मां का सानिध्य हो, शिक्षक के ज्ञान भरे शब्द हों या किसी मित्र का साथ हो जो हमारा पथ-प्रदर्शक बन जाता है। अतः गुरु पूर्णिमा ऐसे सभी शक्तियों को चाहे वह दृश्य हों अथवा अदृश्य, जो हमारा मार्गदर्शन करती हों, हमें सही रूप में ढालती हों और हमारे जीवन में उन्नति के पथ पर हमारा साथ देती हों, सभी को सम्मानित करने का एक पवित्र अवसर है।
गुरु पूर्णिमा का त्योहार व्यक्ति के जीवन और उसके सामाजिक मूल्यों को एक सही रूप में ढालने में गुरु की भूमिका को सम्मानित करने की एक शाश्वत परंपरा है। आसाढ़ मास की पूर्णिमा के इस दिन का गहरा आध्यात्मिक, ऐतिहासिक तथा सामयिक महत्व है क्योंकि इसी दिन आदिगुरु भगवान शिव ने सप्तऋषियों को योग का ज्ञान प्रदान किया था। इसी दिन महर्षि वेदव्यास की जन्म जयंती भी मनाई जाती है। इसके साथ ही, पूर्णिमा के दिन से चतुर्मास आरंभ होते हैं जो मानसून के दौरान के पवित्र चार महीने हैं जबकि साधु-संत किसी एक ही स्थान पर रहकर अपने शिष्यों को ज्ञान देते हैं। आसाढ़ मास की पूर्णिमा के बारे में ऐसा कहा जाता है कि इस दिन चांद के शीतल प्रकाश की ऊर्जा हमारे आंतरिक मन को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करती है। गुरु पूर्णिमा का यह त्योहार हमें उन लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है जिन्होंने हमारे मन में ज्ञान की ज्योति जगाई है।


संस्कृत शब्द “गुरु” दो शब्दों ‘गु’ (अंधकार) और ‘रु’ (हटाना) का संयोजन है जिसका अर्थ होता है एक ऐसा व्यक्ति जो हमारे मन से अंधकार अर्थात अज्ञानता को दूर करता हो। प्राचीन वैदिक परंपरा में गुरु शिष्य परंपरा शिक्षा का आधार थी। गुरुकुल में शिक्षार्थियों को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करके उन्हें विचारशील बनाया जाता था तथा नैतिकता का पाठ पढ़ाकर उनकी नैतिक दुविधाओं का समाधान किया जाता था। गुरुकुल में शिक्षा की यह प्रक्रिया शिक्षार्थियों को कर्म के माध्यम से मूल्य आधारित जीवन जीने व चरित्र निर्माण करने के लिए निरंतर प्रेरित करने की प्रक्रिया थी। गुरु के महत्व और महानता को केवल शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता। गुरु मात्र एक शिक्षक ही नहीं होते बल्कि उनकी उपस्थिति ही एक ऐसी जीवंत शक्ति, एक ऐसी अनुभूति होती है जो शक्ति, मार्गदर्शन और प्रेरणा का एक निरंतर स्रोत होती है। जिस प्रकार पूर्णिमा संपूर्णता, शुद्धता और प्रकाश का प्रतीक है ठीक उसी प्रकार गुरु में भी वैसी ही महानता होती है और गुरु भी ज्ञान से संपूर्ण, निष्कपट और मन से अज्ञानता के अंधकार को दूर करने के स्रोत होते हैं।
प्रसिद्ध संत कबीर ने गुरु की तुलना कुम्हार से और शिष्य की तुलना मिट्टी के कच्चे बर्तन से करते हुए कहा है कि,
“गुरु कुम्हार है, शिष्य कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥”

गुरु एक छिपे हुए और कभी भी खत्म न होने वाले ज्ञान का भंडार है – उनके आशीर्वाद मौन होते हुए भी जीवन में आमूल बदलाव लाने वाले होते हैं और शिष्य के मन में सच्चाई और अच्छाई से जुड़े मूल्यों से युक्त ज्ञान व बुद्धिमत्ता भरते हैं। रामायण काल में विश्वामित्र और भगवान राम के बीच तथा भक्तिकाल में गुरु रविदास और मीरा बाई, रामानंद और कबीर, गुरु नानक देव जी और उनके बाद हुए गुरुओं के बीच का संबंध- सभी भारतीय सभ्यता में आध्यात्मिक और बौद्धिक आदान-प्रदान की अमिट विरासत के उदाहरण हैं। इन पवित्र बंधनों ने समाज को एक नैतिक ढांचा प्रदान किया और इसके आंतरिक विकास को बढ़ावा दिया। आधुनिक युग में, देश के लोगों के मन में राष्ट्रवाद की अलख जगाने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज तथा समाज को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करने में समर्थ गुरु रामदास, स्वामी विरजानंद सरस्वती और स्वामी दयानंद सरस्वती का योगदान अविस्मरणीय रहेगा। इसी गुरु परंपरा में स्वामी रामकृष्ण परमहंस भी हुए हैं जिनकी शिक्षा ने स्वामी विवेकानंद को एक आध्यात्मिक महापुरुष बनाया, जिन्होंने बाद में भारतीय दर्शन को पाश्चात्य देशों तक पहुँचाया। इसी प्रकार, महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, श्री युक्तेश्वर और परमहंस योगानंद जैसे महापुरुषों द्वारा दिए गए ज्ञान की ज्योति दुनिया भर के साधकों का मार्गदर्शन करती रहेगी और उन्हें अपने मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी। उनके द्वारा दिए गए ज्ञान ने विश्व-बंधुत्व की भावना को बढ़ाया है और लोगों को ज्ञान की दिव्य दृष्टि प्रदान की है। विश्व के सभी देशों में देवत्व के प्रति निष्ठा, समर्पण और व्यक्तिगत संबंध को अभिव्यक्त करने की परंपरा देखी जाती है। पश्चिमी देशों में ईश्वर की प्रार्थना के दौरान ‘ओ माई मास्टर’ शब्द का प्रयोग किया जाता है जो ईश्वर के साथ गहरे आध्यात्मिक जुड़ाव का सूचक है।


प्रथम गुरु के रूप में मां शिशु को इस नए विश्व से परिचित कराती है और जीवन में पहला कदम उठाना सिखाती है। अगर दूसरे नजरिये से देखा जाए तो हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां- कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नाक – बाहरी दुनिया से संवेदी सूचनाएं प्राप्त करती हैं, पांचों कर्मेन्द्रियां- हाथ, पांव, वाणी, गुदा, जननांग- शारीरिक क्रियाएं करती हैं तथा अंतःकरण की चारों वृत्तियां – मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त हमारे विचारों, भावनाओं और क्रियाओं को प्रभावित करती हैं। यदि संक्षेप में कहा जाए तो, हमारी ज्ञानेंद्रियां प्रत्यक्ष जगत से प्राप्त जानकारियों को एकत्र करती हैं, मन उन्हें समझता है, बुद्धि निर्णय लेती है, अहंकार अनुभव को वैयक्तिक बनाता है, कर्मेंद्रियाँ क्रिया संपन्न करती हैं और चित्त उसे स्मृति के रूप में दर्ज करता है। गुरु ज्ञान के जिज्ञासुओं को ज्ञान प्रदान करता है जबकि सद्गुरु अपने शिष्यों में बुद्धिमत्ता का संचार करता है। उनके मार्गदर्शन से ही इन सभी अदृश्य आंतरिक जटिलताओं के बीच हमारे मन में सद्गुणों का संचार होता है।


सभी सद्गुणों से युक्त व्यक्ति एक पुष्ट फलों से युक्त फलते-फूलते वृक्ष के समान है जिसकी मज़बूत जड़ों को गुरु के ज्ञान, परिवार के सहयोग और समग्र समाज के मूल्यों से सींचा गया हो। व्यक्ति के कर्म इन आंतरिक मूल्यों की केवल अभिव्यक्ति हैं। पूर्णिमा का विशेष अवसर इन सभी तथ्यों पर आत्मनिरीक्षण का अवसर प्रदान करता है। यह मात्र एक खगोलीय घटना नहीं है, यह एक आध्यात्मिक दर्पण है, एक सांस्कृतिक समारोह है, एक वैज्ञानिक घटना है, तथा जीवन में नवीनता लाने, चिंतन करने तथा कृतज्ञता व्यक्त करने का एक गहन प्रतीकात्मक अवसर है। इसका महत्व धर्म, ज्ञान की विभिन्न शाखाओं और सदियों तक विस्तीर्ण है तथा हमें हमारे अंतःकरण में स्थित प्रकृति की लय और चक्र की याद दिलाता है। पूर्णिमा संपूर्णता और ज्ञानोदय का प्रतीक है- एक ऐसा समय है जबकि हम अपने स्वत्व की खोज सर्वाधिक स्पष्ट रूप में कर सकते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे चंद्रमा सूर्य के प्रकाश को पूरी तरह से परावर्तित करता है। योगी और संत प्रायः पूर्णिमा को गहन ध्यान, जप, उपवास और दिव्य ऊर्जा से जुड़ने के लिए एक आदर्श समय मानते हैं।


गुरु पूर्णिमा सीखने, ज्ञान अर्जन करने और कृतज्ञता व्यक्त करने का त्योहार है। सूचना की भरमार, भ्रम, तुलना और प्रतिस्पर्धा के इस युग में एक सच्चे गुरु की हमारे जीवन में उपस्थिति काफी महत्वपूर्ण है चाहे वह आध्यात्मिक गुरु हों अथवा कोई प्रशिक्षक, शिक्षा प्रदाता, माता-पिता या डिजिटल मार्गदर्शक क्यों न हों। उनकी उपस्थिति धर्म एवं धार्मिक अनुष्ठानों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। 21वीं सदी के अनिश्चितता से भरे दौर में जबकि भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं, आतंकवाद, उग्रवाद, मादक पदार्थों की तस्करी, साइबर युद्ध और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ युवाओं को परेशान कर रही हैं, गुरुओं और संतों की ज्ञान परंपरा का उत्सव गुरु पूर्णिमा पूरी दुनिया के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है। आज के युग में लोगों द्वारा नैतिकता पर बिलकुल विचार नहीं करने एवं गलत और सही कार्यों के बीच अंतर नहीं कर पाने के कारण लोगों के सामने ढेर सारी चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं तथा सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है। ऐसे में गुरु की उपस्थिति मात्र से ही लोगों को गलत रास्ते पर जाने से रोका जा सकता है।


आज हम जैसे-जैसे डिजिटल युग की ओर बढ़ रहे हैं, गुरु पूर्णिमा का शाश्वत संदेश हमें ज्ञान प्राप्त करने, अपने मन की शक्ति से मार्गदर्शन प्राप्त करने, अपने गुरु और मार्गदर्शक का सम्मान करने तथा दूसरों के लिए ज्ञान का स्रोत बनने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह समाज में मानव मूल्यों को पोषित एवं सृजित करने का एक माध्यम सिद्ध होगा।

  • अर्जुन राम मेघवाल,
    केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
    और संसदीय कार्य राज्य मंत्री,
    भारत सरकार
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