राम मंदिर ध्वजारोहण: भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता का आग़ाज़

अयोध्या के राम मंदिर प्रांगण में जो ध्वज फहरा है, वह सिर्फ मंदिर के शिखर पर नहीं लहराया, वह भारत के मन, स्मृति और आत्मा पर भी लहराया है। यह ध्वजारोहण एक धार्मिक घटना भर नहीं है; यह एक नए युग के आरंभ की घोषणा है। यह वह क्षण है जब भारत ने दुनिया को बताया कि हमारी सांस्कृतिक संप्रभुता अब जाग चुकी है, और अब हम अपने ही मूल्यों से, अपनी ही परंपरा से, अपने ही आत्मविश्वास से आगे बढ़ेंगे।

भारत के इतिहास में कई ऐसे क्षण आए हैं जिन्हें हमने स्वतंत्रता के बाद भी पूरी तरह महसूस नहीं किया था, जैसे देश की आत्मा किसी प्रतीक्षा में थी। अयोध्या में ध्वजा का उठना उसी प्रतीक्षा का अंत है। यह सिर्फ ईंट-पत्थर के पुनर्निर्माण का उत्सव नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक आत्मा का पुनर्जागरण है जिसे लंबे समय तक दबाया गया, उपहास किया गया, और कई बार तो अस्तित्वहीन और काल्पनिक साबित करने की कोशिश भी की गई। इस ध्वजा ने मानो भारत को यह भरोसा दिलाया है कि वह अब खुद को बिना किसी अपराधबोध, बिना किसी झिझक और बिना किसी बाहरी वैचारिक बोझ के स्वाभाविक रूप से जी सकता है।

भारत एक आधुनिक राष्ट्र है, लेकिन उसका अस्तित्व आधुनिक नहीं, सनातन है। भारत, भारत 1947 या 1950 में नहीं बना, भारत एक अतिप्राचीन समय से एक सांस्कृतिक इकाई के रूप में विद्यमान था। जिस समय यूरोपीय देशों ने नेशन स्टेट की परिकल्पना भी नहीं की थी भारत उससे बहुत पहले से सिविलाइज़ेशन स्टेट के रूप में अस्तित्व में था। असल भारत तो हजारों वर्षों से सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक सततता के साथ जीता आया है। हमारे लोक-तंत्र की आधारशिला पश्चिम से नहीं, हमारी अपनी मिट्टी से निकली थी, तमिलनाडु के प्राचीन स्वशासन मॉडल से लेकर बसवण्णा के अनुभव मंटप तक, जहाँ विचार-विमर्श और लोक-भागीदारी की पूरी परंपरा विकसित हुई थी। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी जब कहते हैं कि “भारत लोकतंत्र की जननी है,” तो वह केवल एक राजनीतिक पंक्ति नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य का पुनःस्थापन है। यह ध्वजारोहण एक प्रतीक है जो आधुनिक गणराज्य को उसकी प्राचीन सभ्यता से पुनः जोड़ता है। यह वह क्षण है जब सभ्यतागत पहचान राजनीतिक पहचान से ऊपर उठती है, एक दूसरे के विरुद्ध नहीं – बल्कि आपसी सामंजस्य में।

दुनिया के कई राष्ट्र अपने राजनीतिक इतिहास पर गर्व कर सकते हैं, लेकिन भारत जैसा कोई नहीं जो हजारों वर्षों की सांस्कृतिक निरंतरता के साथ आज भी जीवंत हो। इस निरंतरता की खासियत यह है कि भारत ने हर युग में अपने मूल को बचाकर रखा, कभी लोक परंपराओं के रूप में, कभी भक्ति आंदोलन के रूप में, तो कभी सामाजिक सुधार और संत परंपरा के रूप में। यही कारण है कि जब आज अयोध्या में ध्वजा फहरता है, तो यह किसी एक धर्म का नहीं बल्कि पूरी सभ्यता का स्मरण है। यह स्मरण हमें बताता है कि भारत का राष्ट्र चरित्र किसी संविधान सभा ने नहीं बनाया; संविधान सभा ने तो उसे आधुनिक रूप दिया। भारत को गढ़ने का काम तो उसकी सभ्यता ने हजारों वर्षों में किया है।

लेकिन इस सत्य को स्वीकारने में सबसे बड़ी बाधा रही, मानसिक गुलामी। उपनिवेशवाद ने भारत के मंदिर नहीं गिराए; उसने भारत के आत्मविश्वास को गिराया। प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने भाषण में भी इस बात का ज़िक्र करते हुए कहा की मैकाले ने जिस विष को भारत में घोला उसने पीढ़ियों को यह विश्वास दिलाया कि हमारी परंपराएँ पिछड़ी हुई हैं, हमारी सभ्यता हीन है, और पश्चिम ही प्रगति का एकमात्र मानक है। यही वह गुलामी है जिसके अंत का आरंभ भारत अब होते हुए देख रहा है। इस गुलामी की मानसिकता ने भले ही लोगों की मानसिकता में घर कर लिया था लेकिन बावजूद इसके भारत ने कभी अपनी सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को कभी नहीं छोड़ा।

मानसिक गुलामी की जड़ें इतनी गहरी थीं कि कई दशकों तक भारतीय समाज अपने ही सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर झिझकता रहा। मंदिर, धर्म, आध्यात्म, इन सबको आधुनिकता के विरुद्ध खड़ा कर दिया गया, मानो ये भारत की प्रगति में बाधा हों। जबकि सच्चाई यह है कि भारत की प्रगति का हर स्वर्णिम काल, चाहे वह गुप्तकाल हो, चोलकाल हो या विजयनगर, सांस्कृतिक उत्कर्ष के साथ ही आया। ब्रिटिश शासन ने इस ऐतिहासिक संबंध को ही काटने की कोशिश की थी। ध्वजारोहण इसी कटी हुई स्मृति को वापस जोड़ने का कदम है, जिससे देश फिर से अपने स्वभाविक आत्मविश्वास में लौट सके।

इक़बाल ने उर्दू में अपनी एक रचना में लिखा है कि “यूनान, मिस्र, रोम सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशां हमारा।  कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहां  हमारा।।” भारत केवल इसलिए नहीं बचा रहा क्योंकि भारत में अच्छे योद्धा थे, बल्कि भारत इसलिए बचा रहा क्योंकि उसने कभी अपनी सांस्कृतिक रीढ़ को नहीं छोड़ा। इक़बाल की यह पंक्ति इसलिए भी अधिक शक्तिशाली लगती है क्योंकि भारत का अस्तित्व भूगोल से नहीं, बल्कि भावना से तय होता है। भारत तब भी भारत था जब उसकी सीमाएँ आज जैसी नहीं थीं; भारत तब भी भारत था जब कोई राजनीतिक सत्ता अखंड नहीं थी; और भारत आज भी भारत है क्योंकि उसके भीतर एक साझा संस्कृति, साझा स्मृति और साझा आध्यात्मिकता है। यही वह ‘अनुभूति’ है जो आज अयोध्या के ध्वज में फिर से जीवित हो उठी है। और शायद इसी वजह से यह क्षण केवल एक मंदिर का क्षण नहीं है, यह पूरी सभ्यता का क्षण है।

ध्वजारोहण का एक अर्थ होता है राज्य की स्थापना। 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ तो लाल क़िले पे ध्वजरारोहण किया गया यह इस बात का द्योतक है कि यह भारत के एक संप्रभु शासन की स्थापना है। इसी प्रकार यह ध्वजारोहण भारत में धर्म के शासन का द्योतक है। ध्वजारोहण का अर्थ केवल धार्मिक विजय नहीं, बल्कि यह भी है कि भारत अब विकास और शासन का आधार धर्म के मूल्यों पर रखना चाहता है। धर्म यहाँ किसी मजहबी परिभाषा का नाम नहीं, धर्म का अर्थ है न्याय, कर्तव्य, समरसता, करुणा, और सबसे कमजोर को सबसे पहले उठाने की प्रेरणा। यही रामराज्य का सार था। वहाँ लोग इसलिए सुखी नहीं थे कि उनके पास संसाधन बहुत थे; वे इसलिए सुखी थे क्योंकि शासन मूल्य-आधारित था। रामराज्य का विचार सदियों से भारतीय मानस में आदर्श शासन की परिकल्पना के रूप में जीवित रहा है। यह किसी धार्मिक ग्रंथ से निकला हुआ संकल्प मात्र नहीं, बल्कि शासन और समाज दोनों के लिए मूल्य-व्यवस्था का मॉडल है। आज जब प्रधानमंत्री मोदी जी “विकसित भारत 2047” की बात करते हैं तो यह केवल आर्थिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक नैतिक लक्ष्य भी है, विकास का ऐसा मॉडल जो मनुष्य को केंद्र में रखे, जो समावेशी हो, और जो सांस्कृतिक जड़ों से कटकर नहीं बल्कि उन्हीं के साथ खड़ा होकर आगे बढ़े।

अयोध्या में फहराया गया यह ध्वज उसी यात्रा की शुरुआत है। यह हमें याद दिलाता है कि देश तभी मजबूत होता है जब उसकी आत्मा मजबूत हो। यह हमें याद दिलाता है कि विकास तभी स्थायी होता है जब उसकी जड़ें अपनी सभ्यता में हों। कि आधुनिकता का अर्थ अपनी परंपरा को छोड़ना नहीं, बल्कि उसे नए रूप में जीना है। मंदिर ध्वजा में चिह्नित कोविदार का वृक्ष इसी बात का प्रतीक है। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत का सांस्कृतिक पुनरुत्थान केवल भावनात्मक नहीं है, बल्कि यह ठोस नीतियों और जन-भागीदारी पर आधारित है। चाहे वह योग को वैश्विक पहचान दिलाना हो, आयुर्वेद के पुनर्जीवन के प्रयास हों, काशी और उज्जैन का पुनर्निर्माण हो, या आदिवासी परंपराओं का पुनर्आख्यान, हर कदम यह बताता है कि भारत अब अपनी संस्कृति को केवल इतिहास की वस्तु नहीं मानता, बल्कि भविष्य की ऊर्जा मानता है। यह ध्वज दर्शाता है कि एक लंबा अधूरा अध्याय अब पूर्ण हुआ, और एक नया अध्याय शुरू हुआ है, जहाँ जनता अपनी संस्कृति की मालिक है, जहाँ आत्मविश्वास फिर से लौटा है, और जहाँ भारत आत्म-सम्मान के साथ अपनी राह खुद तय कर रहा है।

भारत के लिए यह क्षण इसलिए भी असाधारण है क्योंकि यह शक्ति किसी सत्ता से नहीं आती, यह जनता की चेतना से आती है। आज से कुछ समय पहले तक एक छोटा सा अभिजात वर्ग, दिल्ली की बंद कमरों वाली राजनीति, खान मार्केट की बौद्धिक फैक्ट्रियाँ, और वे लोग जो मानते थे कि भारत को समझने का ठेका केवल उन्हीं के पास है वही देश का विमर्श तय करते थे। वास्तव में भारत में पहली बार ऐसा हो रहा है कि सांस्कृतिक विमर्श जनता से निकलकर नीति निर्माण तक पहुँच रहा है। गाँवों के उत्सव, स्थानीय देवताओं की मान्यताएँ, जनजातीय संस्कृति, और लोक कथाएँ, इन सबको अब भारतीयता के महत्वपूर्ण आधार के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। पहले इन्हें हाशिये पर रखा जाता था, अब इन्हें राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थान मिल रहा है। यह परिवर्तन केवल राजनीतिक नहीं है; यह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्गठन है। और इस परिवर्तन की ध्वजा अयोध्या में फहराई गई है। लेकिन उस ध्वज के उठने ने साफ बता दिया कि भारत अब किसी ‘एलिट नैरेटिव’ से नहीं चलेगा। अब यह देश अपनी जनता, अपनी मिट्टी, अपनी परंपरा और अपनी अस्मिता से दिशा लेगा। अब नीतियाँ और चिंतन उन गलियारों से नहीं, बल्कि जनमानस की सहज बुद्धि और सांस्कृतिक स्मृतियों से निकलेंगे।

इसलिए यह ध्वजारोहण केवल एक क्षण नहीं, यह एक युग की शुरुआत है। यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यह वह बिंदु है जहाँ इतिहास, आस्था, राजनीति और आत्मा एक साथ खड़े हो जाते हैं। और यह संदेश देते हैं कि भारत अब न केवल स्वतंत्र देश है, बल्कि स्वतंत्र चेतना भी है, अपनी परंपरा में गर्व से खड़ा, अपने भविष्य की ओर आत्मविश्वास से बढ़ता हुआ, और अपनी सभ्यता को फिर से विश्व के केंद्र में स्थापित करने के संकल्प के साथ।

  • कृष्ण कान्त जैन, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, स्तंभकार



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