
- अखिलेश कुमार (स्वतंत्र पत्रकार)
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आजादी के करीब डेढ़ दशक बाद ही परिवारवाद को लेकर सवाल उठने लगे थे, जब इंदिरा गांधी कांग्रेस में प्रभावशाली भूमिका निभाने लगी थीं। हालांकि इंदिरा गांधी 1938 से ही कांग्रेस से जुड़कर सक्रिय राजनीति में थीं, इसलिए उस दौर में विपक्ष के आरोप उतने प्रभावी नहीं माने गए। लेकिन समय के साथ राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सक्रियता ने कांग्रेस में परिवार आधारित राजनीति और शीर्ष स्तर पर पारिवारिक नियंत्रण के आरोपों को मजबूत किया।
समय के साथ देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। अधिकांश दल किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित रहे और धीरे-धीरे उनमें परिवारवाद का प्रभाव बढ़ता गया। आज स्थिति यह है कि कई राजनीतिक दलों में परिवारवाद संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। बिहार की राजनीति में भी वर्तमान समय में परिवार को स्थापित करने की होड़ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। इस होड़ में बेटों के साथ-साथ बेटियों, पत्नियों, बहुओं, भांजों, दामादों और समधियों तक को राजनीतिक रूप से समायोजित किया जा रहा है।
बिहार में 1970 के दशक में कांग्रेस विरोधी राजनीति से उभरे प्रमुख नेताओं में लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे नाम शामिल रहे हैं। इनमें लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान ने 1990 के दशक से ही परिवारवाद को बढ़ावा देना शुरू कर दिया था, जबकि नीतीश कुमार लंबे समय तक इसका विरोध करते रहे।
हालांकि अब वे भी इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने अपने पुत्र निशांत कुमार को राजनीति में सक्रिय कर पार्टी से जोड़ दिया। यह कदम उन लोगों के लिए आश्चर्यजनक रहा, जो नीतीश कुमार को परिवारवाद से अलग पहचान वाले नेता के रूप में देखते थे।यदि किसी राजनेता का पुत्र लंबे समय से जनता के बीच सक्रिय रहकर काम करता है, तो समाज में उसकी स्वीकार्यता बनना स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन वर्तमान दौर में बिहार में परिवारवाद के तहत खासकर बेटों को स्थापित करने की जो होड़ दिख रही है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
इसी क्रम में जीतन राम मांझी ने अपने परिवार के कई सदस्यों को राजनीति में आगे बढ़ाया, वहीं चिराग पासवान ने भी अपने रिश्तेदारों को अवसर दिया। इसी तरह कई अन्य नेताओं ने पत्नी, पुत्र, पुत्री और परिजनों को राजनीति में स्थापित किया है।
दो दशक पहले जिस बिहार में लालू प्रसाद यादव पर परिवारवाद का आरोप लगाकर राजनीतिक हमले किए जाते थे, आज उसी बिहार में लगभग सभी दलों में परिवार आधारित राजनीति का प्रभाव दिखाई दे रहा है। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी भी पूरी तरह अछूती नहीं कही जा सकती, हालांकि भाजपा अक्सर राजनीतिक परिवारों से जुड़े उन लोगों को आगे बढ़ाने की बात करती है जो पहले से जनता के बीच सक्रिय रहे हैं।
लोकतंत्र की जननी कहे जाने वाले बिहार में परिवारवाद और कथित रूप से धनबल के बढ़ते प्रभाव ने सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निराश और हतोत्साहित किया है। किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत वे जमीनी कार्यकर्ता होते हैं, जो दल की विचारधारा और नेतृत्व से प्रभावित होकर संगठन को मजबूत बनाने में अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। लेकिन लगातार बढ़ते परिवारवाद और आर्थिक प्रभाव के कारण समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव बढ़ रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।





