बिहार की राजनीति में परिवारवाद का बढ़ता प्रभाव, बेटों को स्थापित करने की होड़

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आजादी के करीब डेढ़ दशक बाद ही परिवारवाद को लेकर सवाल उठने लगे थे, जब इंदिरा गांधी, जवाहरलाल नेहरू के बाद कांग्रेस में प्रभावी बनने लगी थीं। हालांकि इंदिरा गांधी आजादी से पहले, वर्ष 1938 से ही कांग्रेस में शामिल होकर सक्रिय भूमिका निभा रही थीं। ऐसे में विपक्षी दलों के आरोप उस समय अधिक प्रभावी नहीं हो पाए। लेकिन समय के साथ राजीव गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की लगातार सक्रियता के बाद कांग्रेस पर परिवार आधारित राजनीति और शीर्ष स्तर पर पारिवारिक नियंत्रण के आरोप लगते रहे हैं। कांग्रेस पर परिवारवाद हावी होने का मुद्दा विपक्षी दल मजबूती से उठाते रहे हैं।


समय के साथ देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। अधिकांश दल किसी एक व्यक्ति पर केंद्रित रहे और धीरे-धीरे उन पर परिवारवाद का प्रभाव बढ़ता गया। अब स्थिति ऐसी बन गई है कि कई राजनीतिक दलों में परिवारवाद संस्थागत व्यवस्था यानी सिस्टम का हिस्सा बनता दिखाई देता है। इस संदर्भ में जब बिहार की बात करें तो वर्तमान राजनीतिक परिवेश में यहां परिवार को स्थापित करने की होड़ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। इस होड़ में बेटों के साथ-साथ बेटियों, पत्नियों, बहुओं, भांजों, दामादों और समधियों तक को राजनीतिक रूप से समायोजित किया जा रहा है।


जिस बिहार में 1970 के दशक में कांग्रेस विरोधी राजनीति से उभरे प्रमुख नेताओं में लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे नाम शामिल रहे, वहां परिवारवाद को लेकर लंबे समय तक बहस होती रही। लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान ने 1990 के दशक से ही राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देना शुरू कर दिया था, जबकि नीतीश कुमार लंबे समय तक इसका विरोध करते रहे।


हालांकि अब वे भी इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को दल में शामिल कराया और बिना किसी सदन का सदस्य निर्वाचित हुए ही कैबिनेट मंत्री बना दिया, जबकि वह लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे थे। इस कदम के बाद परिवारवाद का विरोध करने वाले नेता के रूप में अलग पहचान रखने वाले नीतीश कुमार भी अब उसी धारा का हिस्सा बन बैठे हैं।


यह सच है कि यदि किसी राजनेता का पुत्र लंबे समय से जनता के बीच सक्रिय रहकर काम करता है, तो समाज में उसकी स्वीकार्यता बनना स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन वर्तमान दौर में बिहार में परिवारवाद के तहत खासकर बेटों को स्थापित करने की जो होड़ दिखाई दे रही है, वह लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े कर रही है।


इसी क्रम में जीतन राम मांझी ने अपने दल से बेटा, बहू और समधीन तक को सदन में पहुंचाया, वहीं चिराग पासवान ने बहनोई से लेकर भांजे तक को राजनीतिक अवसर दिया। एमएलसी दिनेश सिंह ने पत्नी को संसद तक पहुंचाने के बाद बेटी को विधानसभा में जगह दिलाई, जबकि आनंद मोहन ने पत्नी को सांसद और बेटे को विधायक बनाने के बाद राजनीतिक सक्रियता और बढ़ा दी है।


दो दशक पूर्व तक जिस बिहार में लालू प्रसाद यादव पर परिवारवाद का आरोप लगाकर राजनीतिक हमले किए जाते थे, आज उसी बिहार में ऐसे कई नाम जुड़ चुके हैं। सबसे अधिक चर्चा नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार और उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश को लेकर हो रही है, जिन्हें बिना किसी सदन का सदस्य रहे कैबिनेट मंत्री बनाया गया। दोनों नेता अपने-अपने दलों के प्रमुख हैं और सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़े रहे हैं, लेकिन बेटों को तेजी से स्थापित करने की कोशिशों ने उनके विरोधियों को सवाल उठाने का अवसर दे दिया है।


जब लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में फंसे और उनका जेल जाना तय माना जाने लगा, तब उन्होंने अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी। बाद में धीरे-धीरे बेटियों और बेटों को राजनीति में सक्रिय किया गया। उस समय विपक्ष ने उन पर परिवारवाद का आरोप लगाते हुए कांग्रेस की राह पर चलने की बात कही थी। लेकिन आज लगभग सभी दल उसी राह पर चलते दिखाई दे रहे हैं। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी भी पूरी तरह अछूती नहीं है। हालांकि भाजपा का तर्क रहता है कि राजनीतिक परिवारों से जुड़े उन लोगों को अवसर दिया जाता है, जो जनता और संगठन के बीच सक्रिय रहे हों।


लोकतंत्र की जननी कहे जाने वाले बिहार की राजनीति में परिवारवाद के साथ-साथ कथित रूप से धनबल के बढ़ते प्रभाव ने सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ताओं को निराश और हतोत्साहित किया है। किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत वे जमीनी कार्यकर्ता होते हैं, जो नेता और विचारधारा से प्रभावित होकर संगठन की जड़ों को मजबूत बनाने में अपना तन-मन-धन लगा देते हैं। लेकिन लगातार बढ़ते परिवारवाद और आर्थिक प्रभाव के कारण समर्पित कार्यकर्ताओं में निराशा का भाव बढ़ता दिखाई दे रहा है, जिसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक माना जा रहा है।

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