जहां सरहदें खत्म होती हैं, वहां से शुरू होती है संस्कृति: शाहाबाद-झारखंड संबंध

रांची। भौगोलिक सीमाएं भले ही राज्यों को अलग कर दें, लेकिन संस्कृति की जड़ें अक्सर इन सीमाओं से कहीं अधिक गहरी और व्यापक होती हैं। कुछ ऐसा ही रिश्ता है बिहार के शाहाबाद क्षेत्र और झारखंड के बीच—एक ऐसा सांस्कृतिक सेतु, जो समय के साथ और मजबूत होता नजर आता है।रविवार की शाम रांची के मोरहाबादी स्थित प्रेस क्लब सभागार में आयोजित सेमिनार “शाहाबाद का गौरवशाली इतिहास और इसका झारखंड से संबंध” इसी गहरे रिश्ते की गूंज बनकर सामने आया। कार्यक्रम में जुटे बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और समाजसेवियों ने न सिर्फ इतिहास को याद किया, बल्कि भविष्य के लिए सांस्कृतिक एकता को और सशक्त बनाने का संकल्प भी लिया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और आयोजन समिति के अध्यक्ष अखिलेश कुमार ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में शाहाबाद की छाप आज भी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उन्होंने विशेष रूप से उरांव समाज का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके पूर्वजों का संबंध रोहतासगढ़ से रहा है, जो इस ऐतिहासिक रिश्ते का मजबूत प्रमाण है।

यह केवल इतिहास की बात नहीं, बल्कि आज भी झारखंड के कई हिस्सों में भाषा, परंपरा, रीति-रिवाज और सामाजिक संरचना में शाहाबाद की झलक मिलती है।

सेमिनार में वक्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि बिहार और झारखंड दोनों ही प्राकृतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद समृद्ध हैं। जस्टिस डॉ. एस. एन. पाठक ने कहा कि इन क्षेत्रों की प्राकृतिक सुंदरता किसी भी प्रसिद्ध पर्यटन स्थल से कम नहीं है।वहीं आईआरएस अधिकारी विजय कुमार मुंडा ने आदिवासी और शाहाबाद की सांस्कृतिक समानताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि यह समानता केवल परंपराओं में ही नहीं, बल्कि जीवनशैली और सोच में भी झलकती है।

शाहाबाद क्षेत्र की भोजपुरी भाषा और लोकसंस्कृति का प्रभाव झारखंड के कई इलाकों में आज भी जीवित है। लोकगीत, त्योहार और पारंपरिक रीति-रिवाज इस साझा विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं।

यह संबंध केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान में भी सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

सेमिनार में शामिल बुद्धिजीवियों ने इस बात पर सहमति जताई कि इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध को केवल याद करने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने और मजबूत करने के लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।

कार्यक्रम में झारखंड और बिहार के विभिन्न जिलों से आए लोगों की भागीदारी इस बात का प्रमाण थी कि यह रिश्ता आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।

सेमिनार में झारखंड और बिहार के विभिन्न जिलों से आए लोगों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि यह रिश्ता केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है।

आज के समय में, जब क्षेत्रीय पहचान अक्सर सीमाओं में बंध जाती है, शाहाबाद और झारखंड का यह संबंध एक संदेश देता है—संस्कृति कभी सीमाओं में नहीं बंधती।

गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय के सचिव गोविंद नारायण सिंह ने शाहाबाद के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया।इस दौरान सेवानिवृत्त जिला जज शिवनारायण सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता प्रिया मुंडा, रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. विमलेश सिंह, कर्नल राजेश कुमार और धर्मेंद्र तिवारी सहित कई वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे और सांस्कृतिक संबंधों को और सुदृढ़ करने पर जोर दिया।

कार्यक्रम का संचालन संजय पासवान ने कुशलतापूर्वक किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन भूषण उरांव ने प्रस्तुत किया।

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