आलेख : आखिर हिन्दी कब तक झेलेगी सियासत का दंश (ललित दुबे)/ कविता : अनुत्तरित प्रेम पत्र (ध्रुव गुप्त)

आखिर हिन्दी कब तक झेलेगी सियासत का दंश
ललित दुबे

मैं हिंदी हूं, राजनीतिज्ञों की उपेक्षा की शिकार। मजबूरी में मुझे अंग्रेजी की सहचरी बनकर रहना पड़ रहा है। बड़ा अजीब-सा है यह मेरा अपना देश। विभिन्न जातियों, अनेक धर्मों और अनेक बोलियों में बिखरी-बंंटी इसकी विभिन्नता को एक इकाई में पिरोकर रखने का प्रयास कुछ टेढ़ा है और मुश्किल के कांटों से भरा हुआ भी। मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि आम जनमानस से जुड़ी होने के बावजूद सियासी कांटों के जंगल में उलझकर मेरा ऊर्जस्वी लहू रिसता रहा है और इस तरफ से सभी बेखबर हैं, आंख मूंदे हुए हैं। मैं सियासत के खेल में कब तक झेलूंगी अपनों का दंश? अगर मैं आवाम की आवाज हूं तो क्या यह आवाज गर्व के साथ इस देश की आवाम को नहीं मिलनी चाहिए? इस राष्ट्र और इसके संविधान से मेरी आरजू है कि मेरी आवाज मुझे वापस दे दो, मेरी आवाज को काट कर राष्ट्र को गूंगा मत बनाओ। शायद इन्हींशब्दों-सवालों के रूप में यह 130 करोड़ भारतवासियों की राष्ट्रभाषा या दूसरे शब्दों में कहें तो मां हिन्दी की पीड़ा के ये स्वर हैं।
प्रतिनिधि भाषा ही राष्ट्र की आवाज :
राष्ट्रीयता राष्ट्र की परिकल्पना की परिधि का केंद्र बिंदु है। किसी भी राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति का मुखर और सबल आधार भाषा है। यही वह तत्व है, जो राष्ट्रीय जीवनधारा की एका को चिरस्थायित्व प्रदान करता है और नागरिक जीवन में एकरूपता, समरसता का उदय करता है। बड़ा स्पष्ट सवाल है कि राष्ट्रीय एकता की आधारभूत आवश्यकता क्या है? आखिर किन मान्यताओं, कौन-सी परंपराओं और किन समानताओं पर राष्ट्र की इमारत तैयार की होती है? क्या ऐसी कोई राष्ट्रीय इमारत हो सकती है, जिसमें कहीं से भी किसी ऐेसे घुसपैठिए को प्रवेश की इजाजत न हो जो विघटन के बीज को इस इमारत की बुनियाद में आरोपित कर सके? ऐेसा कौन सा न्यूनतम आधार हो सकता है, जिस पर यदि आम सहमति न हो तो भी कदम-से-कदम मिलाकर एकसाथ बढ़ाने में किसी राष्ट्रीय नागरिक को आपत्ति न हो? सवालों के संदर्भ में वास्तव में उत्तर वही होगा, जो जनता की आवाज होगी। किसी भी देश की प्रतिनिधि भाषा ही राष्ट्र की आवाज होती है। राष्ट्र का व्यापक प्रतीक भी वही होती है।
राष्ट्रभाषा का कोई विकल्प नहीं :
देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों का संसद जनता का सर्वोच्च सदन है। संसद की दीवारों से जो आवाज टकराती है वह सिर्फ अपने राष्ट्र में ही नहीं, सारे विश्व को हमारी प्रगति, हमारे प्रयास और हमारी एकजुटता को भी प्रतिध्वनित करती है। सदन राष्ट्र की सर्वोच्च सत्ता है, जिसमें नागरिक का अधिकार और कर्तव्य परिभाषित किया जाता है। सदन में देश के हर नागरिक का प्रतिनिधित्व चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता है। इसलिए प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्त जनसामान्य की समस्याएं, जनहित की भावनाएं सदन में व्यक्त होती है। सदन की गरिमा और उपादेयता इसमें निहित है कि उसकी महत्वपूर्ण कार्रवाई का अवलोकन का अवसर और विषयवस्तु की तथ्यपरक जानकारी हर नागरिक को मिले। हर नागरिक अपने इस अधिकार से लाभान्वित हो कि उसकी समस्याओं पर राष्ट्र का सर्वोच्च सदन विचार-विनियम में गंभीरता से रुचि ले रहा है। यह नागरिक अधिकारों की उपयोगिता ही नहीं है, बल्कि जनतांत्रिक आवश्यकता भी है। सदन का उद्घोष राष्ट्रभाषा की गरिमा को व्यापकता न दे, तब भी राष्ट्रभाषा सदन की भाषा बनकर उद्घोषित हो तो भी बात जन-जन तक पहुंच सकती है। सशक्त, समर्थ और सजीव माध्यम ही जनसामान्य तक पहुंच सकता है और नागरिक अधिकारों को गतिशीलता प्रदान कर सकता है। इसमें कोई शक नहींकि ऐसा गुण राष्ट्रभाषा के अलावा कोई अन्य माध्यम नहीं रख सकता। कोई विकल्प होता तो राष्ट्रीय भाषा की अहमियत का चिराग कभी का धूमिल हो चुका होता।
हिन्दी में सबल राष्ट्रभाषा का सामथ्र्य :
यह कहना कहीं से न तो आग्रहपूर्ण है और न ही दुराग्रहपूर्ण कि हमारे राष्ट्र में जन-जन की आवाज, जन-जन की भाषा हिंदी है। यह कहना हिंदी के साथ उदारतावश या पक्षपात के वशीभूत होकर किया गया निर्णय नहीं है। इस कथन के पीछे राष्ट्र की एकता, अखंडता और सार्वभौमिकता की भावना निहित है, जिसकी आज राष्ट्र को ज्यादा जरूरत है। इस राष्ट्र की विभिन्नताओं को एकजुट रखने, समेटने की सामथ्र्य हिंदी में ही है, क्योंकि इसका एक व्यापक जनाधार है। इसका सामथ्र्य राष्ट्र की एकता की संकटकालीन क्षणों में संजीवनी का कार्य कर सकता है। क्षेत्रीय भाषाओं का विकास और प्रयास इसी मूल भावना में निहित है। एक सबल राष्ट्रभाषा के विकास के बिना क्षेत्रीय भाषाओं की परिकल्पना अधूरी है। भाषा सामथ्र्य का जो बल और विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने की जैसी प्रवृत्ति हिंदी भाषा में है, वह एकता और अखंडता के लिए गतिशीलता बनाए रखती है।
अनेक देश राष्ट्रभाषा के बूते समृद्ध :
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया। लेकिन आज तक हिंदी को राष्ट्रभाषा का गौरवपूर्ण स्थान नहीं मिल पाया। इस संबंध में जो जिम्मेदारी केंद्र सरकार को सौंपी गई, वह राजनीतिक और क्षेत्रीय दबाव में ज्यों-का-त्यों पड़ी है। यही वजह है कि हिंदी अभी भी अंग्रेजी की अनुगामिनी बनी हुई है। राष्ट्रीय एकता की समस्या उस बीमारी-महामारी के रूप में नागरिकों के सामने खड़ी है। इस बीमारी-महामारी के इलाज के कष्ट को सहने के माद्दा का निर्माण करने के बजाय बीमारी को भोग लेने का प्रश्रय दिया जाता रहा है। अंग्रेजी के बिना प्रगति की कल्पना नहीं करने वाला वर्ग उन देशों की तरफ देखने से परहेज करता रहा है, जो बिना अंग्रेजी विशुद्ध रूप से अपनी राष्ट्रीय भाषा के बल पर ही समृद्ध हुए हैं। जर्मनी, जापान, रूस और कोरिया आदि इसके उदाहरण हैं।
राजनीति के छल-छद्म में उलझी हिन्दी :
हिंदी को सही मायने में राष्ट्रभाषा के रूप में बहुत पहले स्थापित हो जाना चाहिए था। लेकिन राष्ट्र की सिरमौर हिंदी अपने ही घर की राजनीति के छल-छद्मों में उलझी हुई है। हिन्दी हिन्दी पखवाड़ा के अवसर पर हर देशवासी से पूछ रही है कि आखिर भारतीय संविधान में दी गई अपनी आवाज की व्यवस्था को देश का हर नागरिक क्यों नहीं मानना चाहता? दरअसल जरूरत हिंदी पखवारा पर हिंदी की सिसकियों को आवाज देने, शब्द देने और सुगढ़ स्वरूप देने की है, क्योंकि इस मौके पर राष्ट्र यदि बोलेगा तो उसकी आवाज राष्ट्रीय एकता की आवाज होगी और उसकी भाषा हिंदी राष्ट्रभाषा ही होगी।

लेखक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार है
9639010218

कविता / अनुत्तरित प्रेम पत्र
ध्रुव गुप्त

एक जमाने बाद मैंने उसे देखा
ट्रेन के अपने डिब्बे में
निचले बर्थ को लेकर
टीटी से उलझी हुई
मैं एक तरफ खड़ा होकर
उसके पलटने का इंतजार करता रहा
और सोचता रहा
कालेज की उस सांवली दुबली लड़की
और अपने उस प्रेमपत्र के बारे में
जो मैं उसके हाथ में रखकर
एक बार भाग आया था
और जिसका जवाब
मुझे कभी नहीं मिला।

मुझे देखकर वह चौंकी
फिर जरा-सा मुस्कुराकर पूछा-
कैसे हो,
मेरे बर्थ पर बैठकर
वह देर रात तक बातें करती रही
अपने घर-परिवार
अपने पति-बच्चों
अपनी अनंत व्यस्तताओं
और अपने बढ़ते मोटापे के बारे में।

सुबह ट्रेन से उतरते वक्त
उसने एक जरा-सा हाथ हिलाया
और तेजी से स्टेशन की भीड़ में खो गई।

मैं पिछली रात से लेकर सुबह तक
एकटक तलाशता रहा था
उसकी थकी आंखों
उसकी लंबी, बेशुमार बातों में
अपने उस प्रेमपत्र का उत्तर
जो मुझे आज भी नहीं मिला।

वरिष्ठ कवि और पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, पटना
(साभार : फेसबुक वाल)

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