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प्रसंगवश/कृष्ण किसलय : सूर्य पूजा की आदि भूमि विश्वविश्रुत सोन-घाटी

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सूर्यपूजा की आदिभूमि विश्वविश्रुत सोन-घाटी
-कृष्ण किसलय
(समूह संपादक, सोनमाटी)

-विश्व के अति प्राचीन लोकपर्व छठ में अंतरराष्ट्रीय संस्कृति-सम्मिश्रण के हजारों साल पुराने चिह्न।
-भारत से ईरान तक गई सूर्योपासना की आदिम सांस्कृतिक शैली।
-शकद्वीप से लौटी मार्तण्ड अराधना की मूर्ति-पद्धति।
-भारत का पहला सूर्य प्रतिमा वाला मंदिर बिहार के विश्वविश्रुत सोन नद के किनारे।

(सूर्य को अर्घ्य देतीं छठव्रती महिलाएं)

जीवनदाता सूर्य के प्रति चार दिवसीय पूजन-उपक्रम (नहाय-खाय, खरना, डूबते-उगते सूर्य को अघ्र्य) के साथ जरिये आभार व्यक्त करने वाला कार्तिक छठ दुनिया का सबसे अति प्राचीन लोकपर्व है, जिसकी आदि भूमि बिहार-झारखंड की विश्वविश्रुत सोन घाटी है। सोन घाटी का क्षेत्र सूर्य उपासना का विश्व का प्राचीनतम केन्द्र है, जहां बिना पुरोहित, बिना यज्ञ-विधि और बिना शास्त्रीय विधान के सूर्य-पूजा की जाती रही है। रोजी-रोटी के लिए अपने इलाके से बाहर जाने के कारण पिछली सदियों में इस पर्व का विस्तार देश-विदेश के उन विभिन्न क्षेत्रों में भी हुआ, जहां-जहां बिहारी अपने साथ इस धार्मिक संस्कृति को ले गए। इसीलिए छठ को बिहारियों (बिहार-झारखंड निवासी) का विशेष लोकपर्व माना जाता है। सूर्य प्रतिमा वाला पहला मंदिर बिहार के सोन-घाटी में सोन नद तट के सबसे बड़े शहर डेहरी-आन-सोन से 30 किलोमीटर उत्तर सोन नद के पश्चिम किनारे देव-मार्कण्डेय (थाना काराकाट, प्रखंड नासरीगंज, जिला रोहतास) में ईसा-पूर्व प्रथम सदी में बना था।

आदिमानव ने आरंभ की जीवनदाता सूरज की अराधना

(सोन-घाटी के रोहतास-औरंगाबाद जिला अंतर्गत काराकाट संसदीय क्षेत्र के सांसद महाबलि सिंह से डेहरी-आन-सोन सिंचाई डाकबंगला में विरासत संरक्षण और जागरूकता-प्रसार पर विमर्श करता सोनघाटी पुरातत्व परिषद, बिहार का प्रतिनिधि मंडल )

पृथ्वी पर अंतिम हिमयुग समाप्त होने पर सोन-घाटी में स्थित बिंध्य पर्वत श्रृंखला की पूर्वी-उत्तरी कड़ी कैमूर पहाड़ की गुफाओं से निकलने-उतरने के बाद आदिमानव (होमोसैपियन) ने जब सोचना शुरू किया, तब उसे सदियों के आरंभिक चिंतन से अहसास हुआ कि सूर्य जीवन-दाता है और जीवनदाता के प्रति उसने आभार व्यक्त करने का एक तरीका ईजाद किया। सोन-घाटी में आदिमानव द्वारा संभवत: 10 हजार साल से भी बहुत पहले शुरू हुई सूर्य-उपासना की प्रकृतिबद्ध सांस्कृतिक यात्रा हजारों किलोमीटर दूर पश्चिम-उत्तर दिशा में हरियाणा, पंजाब, सिंधु घाटी (सिंध, पाकिस्तान), खैबर-पख्तुनवा, अफगानिस्तान, तुर्कीस्तान, ईरान, इराक होते हुए सुदूर एशिया के अंतिम छोर मिस्र के निकट तक पहुंच गई। यायावर मनुष्य की हजारों सालों की विकास-यात्रा में प्राचीन सभ्यताओं के सांस्कृतिक सम्मिश्रण से सूर्यपूजा की प्रतीक-पद्धति ने भिन्न-भिन्न रूप-आकार ग्रहण किए होंगे, जो दो हजार वर्ष पूर्व अपनी मूल भूमि सोन-घाटी में शक शासकों के साथ सूर्य-प्रतिमा-प्रतिष्ठा के रूपांतरित कर्मकांड से लैस होकर वापस लौटी। इसके लिए सूर्य-पूजक शकों के साम्राज्य के समय शक द्वीप से भारत में आधिकारिक जानकार पुरोहित बुलाए गए। उन्हीं पुरोहितों के वंशधरों में एक शकद्वीपीय ब्राह्मण ज्योतिषाचार्य-गणितज्ञ वराह मिहिर भी थे। मिहिर सूर्य को कहते हैं। वराह उस समय बिहार के सोन नद से पूरब मगध देश का सबसे बड़ा सम्मान था। तब शक ब्राह्मणों द्वारा ओढ़ी जाने वाली सिल्क की कढ़ाईदार चादर इस्तब्रक कही जाती थी, जिसे ही महाकवि-नाटककार वाणभट्ट ने अपने ग्रंथ हर्षचरित में स्तवरक कहा है।

पारसी धर्म के प्रवर्तक जरथुस्त्र के पूर्वज हैं शकद्वीप वासी

(देव-मार्कण्डेय मंदिर की वर्ष 2008 में ली गई तस्वीर)

बिहार-झारखंड के सकलदीपी ब्राह्म्ïाण शकद्वीप (प्राचीन ईरान) से आए मग पुजारियों के ही वंशज हैं। शकद्वीप वासी पारसी धर्म के प्रवर्तक-पैगम्बर जरथुस्त्र के पूर्वज रहे हैं। अहुर मज्दा (ईश्वर) के संदेहवाहक माना जाने वाले जरथुस्त्र ही जरथुस्त्री (पारसी) धर्म के संस्थापक थे, जिन्होंने अवेस्ता धर्मग्रंथ की रचना की। यह प्राचीन ईरानी धर्म और प्राचीन हिन्दू धर्म (सनातन) के सम्मिश्रण से मिलकर बना है या इसमें दोनों ही धर्मों के लक्षण पाए जाते हैं। इस धर्म ने यहूदी और ईसाई धर्म को प्रभावित किया था या इससे ही दोनों धर्म का अवतरण हुआ। अरब देश में इस्लाम के उदय-विस्तार के बाद कोई 12 सदी पहले अपने धर्म और जीवन की रक्षा के लिए जो लोग फारस से भागकर भारत आए, आज के भारतीय पारसी उन्हीं के वंशधर हैं। शकद्वीप वासी प्राचीन ईरानी यानी मिहिर लोग वास्तु-मूर्ति कला में माहिर थे। माहिर और मंदिर दोनों ही शब्द मिहिर के ही अपभ्रंश हैं। ईरान में सूर्यदेव को मंदिरस्वामी कहा जाता था। बहरहाल, इतिहास में पीछे जाएं तो महाकाव्य महाभारत के भीष्मपर्व (अध्याय-11) में कृष्ण के पुत्र शाम्ब की एक कथा है। शाम्ब ने मूलस्थान (मुलतान) में चंद्रभागा (चेनाब) नदी के किनारे स्थित सांबपुरा में सूर्य-मंदिर के निर्माण के लिए शकद्वीप से ही वास्तुविदों को बुलाया था। हालांकि देव-मार्कण्डेय से भी कोई पांच सदी पुराना सूर्य मंदिर भी भारतीय उपमहाद्वीप में ही है, मगर वह जगह (मुलतान) अब भारत का हिस्सा नहीं है। पाकिस्तान में स्थित मुलतान में ईरानी योद्धा और इतिहासविद स्कैलेक्स ने ईसा से 519 साल पहले सूर्यमंदिर देखा था, जिसमें सोना की कोट-बूट धारी सूर्य प्रतिमा थी। इस बात की पुष्टि प्रसिद्ध इतिहासकार स्ट्रैबो और हेरोडोटस ने भी की है। ईरान के सम्राट दरयवासु (दारा प्रथम) ने सिंधु नदी के उद्गम का पता लगाने के लिए स्कैलेक्स को सिंध देश (पंजाब, पाकिस्तान) भेजा था।

बुकानन ने बताया सूर्यमंदिर, कनिंघम ने खोजी सूर्य-प्रतिमा

(पुराविद एचबीडब्ल्यू गैरिक का प्राचीनतम सूर्यमंदिर ध्वंसावशेष का रेखाचित्र 1881)

देव-मार्कण्डेय मौजूदा भारत का सबसे प्राचीनतम सूर्य मंदिर है, जिसके बारे में प्रख्यात इतिहासविद डा. डीआर पाटिल ने 1963 में प्रकाशित अपनी पुस्तक दि एंटीक्वारैन रिमैन्स इन बिहार में कहा है कि यह सूर्य मंदिर कालांतर में विष्णु मंदिर में परिवर्तित हो गया, जिसका स्थापत्य (बनावट) गुप्तकाल में निर्मित देव-वरुणार्क मंदिर (बिहार के औरंगाबाद जिला) के उदीच्य स्थापत्य यानी यूनानी शैली से मिलती है। ब्रिटिश सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन 01 दिसम्बर 1812 को देव-मार्कण्डेय पहुंचे थे। उन्होंने प्रस्तर-लेख देखा था, जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि ईसा से 63 वर्ष पूर्व राजा फुदीचंद चेरो की रानी गोभावनी ने देव-मार्कण्डेय मंदिर बनवाया। तब तक मगध में शकों का काफिला आ धमका था। हालांकि शक संवत (कैलेंडर) की शुरुआत इनका राज मजबूत होने पर ईसा के 78 वर्ष बाद हुई। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम और पुराविद एचबीडब्ल्यू गैरिक 1881 में फ्रांसिस बुकानन के करीब 70 साल बाद देव- मार्कण्डेय गए थे। फ्रांसिस बुकानन की यात्रा के वक्त हरिहरगंज (नासरीगंज)-सासाराम सड़क थी। गैरिक के समय डेहरी-आन-सोन से निकली विश्वप्रसिद्ध सोन नहर प्रणाली अस्तित्व में आ चुकी थी। वह आरा (भोजपुर) से सोननहर में स्टीमर से 10 घंटे की यात्रा कर देव-मार्कण्डेय पहुंचे थे। उन्होंने देव-मार्कण्डेय मंदिर की खुदाई कराई। उन्हें फ्रांसिस बुकानन द्वारा देखा गया प्रस्तर-लेख नहीं मिला, मगर यह माना कि देव-मार्कण्डेय का स्थापत्य औरंगाबाद जिला के देव-वरुणार्क से पूर्ववर्ती (पुराना) है। कनिंघम ने यहां 2.4 फीट की सूर्य प्रतिमा खोजी। गैरिक ने मंदिर ध्वंसावशेष का रेखाचित्र बनाया था। रेखाचित्र वाला मंदिर अवशेष भी देव-मार्कण्डेय में अब नहीं बचा है।

शब्द, भाषा-रूप से भी तय होती है सभ्यता-संस्कृति की प्राचीनता

(बिहार के कैमूर पर्वत पर प्राचीनतम रोहतासन मंदिर, जहां हर साल पहुंचते हैं देश-विदेश से सूर्यपूजकों के वंशधर))

शब्द हजारों साल में लुप्त हो जाते हैं और भाषाएं रूप बदल लेती हैं। जीवाश्म की तरह बचे रह गए शब्द को टटोलकर, सांस्कृतिक परिवर्तन की श्रृंखला को जोड़कर और तर्क-साक्ष्य की कसौटी पर कसकर ही इतिहास के अनुमान-निष्कर्ष निर्धारित होते हैं। फिर प्रकाश में आई नई जानकारी, नई वैज्ञानिक खोज के सापेक्ष सबकी संगति बैठाई जाती है। स्थान विशेष की संस्कृति-धरा पर विजातीय संस्कृति के आगमन-संक्रमण की प्रतिक्रियाओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। तब कहीं जाकर इतिहास बनता, इतिहास का सच तय होता और इतिहास-लेखन होता है। छठ में इसी अध्ययन-अनुशीलन को देखा-अनुभव किया जा सकता है। छठ व्रत में प्रयुक्त जमीन के भीतर पैदा होने वाला आदिम कंद-मूल (सूथनी यानी वराहकंद, ओल, शकरकंद, अदरख), नारियल फल, केला, ईख आदि संकेत करते हैं कि यह स्थानीय सोन-घाटी मूल का ही पर्व है। कैमूर अंचल की एक वनवासी जाति अपने को सूर्यवंशी (सूइअर) बताती रही है। सोन-घाटी के पूरब झारखंड में आदिवासियों की पूजा सूरजाही में छठव्रत की तरह डूबते सूर्य को अघ्र्य देने की परंपरा है। सूरजाही में सुबह में सफेद बकरे की बलि भी दी जाती है, जो बताता है कि इसमें आदमी के कई हजारों साल पुराने शिकारी जीवन की परिपाटी जारी है। इसमें आदिम वन्यजीवन का वह डर है कि सूर्य के डूबते ही जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। कुड़मालि आदिवासी लोककंठ में महफूज खोरठा गीत में इसका प्रमाण खोजा जा सकता है- ‘एतो जदी जान तलो सूरूज देवा अइता गो, एगो चरक पाठा रखतलो जोगाये गो’। सोन-घाटी के लोकगीतों में सूर्यश्रद्धा के आरंभिक तत्व को देखा जा सकता है- ‘केरवा जो फरेला घवद से ओह प सुगा मंडराय, उ जे खबरि जनइबो अदिक से सुगा देले जुठिआय, उ जे मरबो रे सुगा धनुक से सुगा गिरे मुरझाय, उ जे सुगनी जे रोवे ले विरह से अदित होहू न सहाय…’। एक अन्य भोजपुरी लोकगीत में सभ्यता के एकदम आरंभिक समय के तत्व अभी मौजूद हैं- ‘काच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय…’।

राम से पहले रचा गया सूर्यस्तुति का गायत्री मंत्र

(बिंध्य पर्वतश्रृंखला के एकदम अंतिम उतरी-पूरबी सिरे कैमूर पहाड़ से 1999 में अवलोकन करते सोनघाटी पुरातत्व परिषद, बिहार के सचिव कृष्ण किसलय)

सूर्यस्तुति के मंत्र (गायत्री) के सर्जक वह विश्वमित्र हैं, जिनसे सोनघाटी की कैमूर-बिंध्य पर्वत श्रृंखला से पश्चिम-उत्तर स्थित अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सत्यव्रत (त्रिशंकु) को सशरीर स्वर्ग भेजने के प्रयास की पौराणिक कथा जुड़ी है। सोनघाटी के यह विश्वमित्र राम के समय के नहीं, बल्कि पूर्ववर्ती विश्वमित्र (विश्वरथ) थे। राजा सत्यव्रत सत्यवादी हरिश्चंद्र के पिता और राम के पुरखे थे। विश्वरथ के समय सोन-घाटी सभ्यता का रथ काफी आगे बढ़ चुका था। मानव-बुद्धि अपने अगले पायदान पर थी। विश्वरथ ने जिस मंत्र की रचना की, वह भारतीय वाग्मय की श्रुति परंपरा में नई सृष्टि मानी गई, क्योंकि ऋग्वैदिक सूक्त-सृजन के हजारों वर्ष के इतिहास में वह प्रथम गेय मंत्र था, छंदबद्ध रचना थी- ‘तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात्’।

-लेखक विज्ञान के इतिहास ‘सुनो मैं समय हूं’ के रचनाकार, सोन-घाटी की सभ्यता-संस्कृति के अध्येता-शोधकर्ता और सोनघाटी पुरातत्व परिषद, बिहार के सचिव हैं।
-तस्वीर संयोजन : निशान्तराज (प्रबंध संपादक, सोनमाटी), अवधेशकुमार सिंह (संयुक्त सचिव, सोनघाटी पुरातत्व परिषद, बिहार)

संपर्क : सोनमाटी-प्रेस गली, जोड़ा मंदिर, न्यू एरिया, पो. डालमियानगर-821305, डेहरी-आन-सोन, जिला रोहतास (बिहार)
फोन 9708778136, 9523154607

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