जीवन के आरंभिक एक हजार दिन बेहद संवेदनशील

डेहरी-आन-सोन (रोहतास)-कार्यालय प्रतिनिधि। नई पीढ़ी के स्वास्थ्य के लिए मां का स्वस्थ होना जरूरी है। जीवन के शुरुआती एक हजार दिन पोषण और विकास के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं। बच्चे के दिमाग के विकसित होने के लिए पहला दो साल बेहद संवदेनशील होता है। यह जानकारी पटना एम्स की स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रोफेसर डा. हेलानी सिन्हा ने दी। एलाइव एंड थ्राइव की के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी डा.अनुपम श्रीवास्तव ने बताया कि मां स्वस्थ होगी, तभी बच्चा स्वस्थ और निरोग होगा। इसलिए गर्भकाल और प्रसूती होने के बाद मां के पोषण का उच्चस्तरीय ख्याल रखना जरूरी है।
नारायण चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (एनएमसीएच) में दो दिवसीय नर्सिंग प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन एलाइव एंड थ्राइव कंपनी के सहयोग से किया गया। इस दो दिवसीय कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह का शुभारंभ गोपालनारायण सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति डा. एमएल वर्मा, प्रबंध निदेशक त्रिविक्रम नारायण सिंह, नारायण चिकित्सा महाविद्यालय के प्राचार्य डा. एसएन सिन्हा के साथ अन्य प्रमुख अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। आरंभ में नर्सिंग अधीक्षक अनीशबाबू थानांकी ने आगत अतिथियों का स्वागत किया। उद्घाटन समारोह में नारायण चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल के प्रसूती विभाग, शिशु रोग विभाग, पीएसएम विभाग के अध्यक्ष और चिकित्सा प्राध्यापक उपस्थित थे।
उधर, नारायण चिकित्सा महाविद्यालय के हृदय रोग विभाग की ओर से भी उच्च रक्त चाप पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें हृदय रोग विभाग के प्रभारी डा. गिरीशनारायण मिश्र ने उच्च रक्त चाप के कारण, इससे होने वाले शारीरिक नुकसान और बचाव-उपचार के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस संगोष्ठी में चिकित्सक और चिकित्सा के विद्यार्थियों ने भाग लिया। इस संगोष्ठी का आयोजन दवा कंपनी सीनसान फार्माट्युटिकल्स प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से किया गया।
(रिपोर्ट, तस्वीर : भूपेंद्रनारायण सिंह, पीआरओ, एनएमसीएच)

 

मातृ मृत्युदर : काबू पाने के लिए अब आईं अंतरा और छाया

सासाराम (रोहतास)-सोनमाटी समाचार। जनसंख्या नियंत्रण के परिवार नियोजन, वांछित समय पर गर्भधारण करने और मातृ मृत्युदर पर काबू पाने के लिए अब दो गर्भनिरोधक अंतरा और छाया हर स्वास्थ्य केेंद्र पर नि:शुल्क उपलब्ध हैं। गर्भ निरोधक साधन के इस्तेमाल में गति लाने और सामुदायिक स्तर पर इसके अधिक इस्तेमाल के लिए सरकार द्वारा इन दो नए गर्भ निरोधक की शुरुआत की गयी है। इसके लिए आशा और एएनएम को जिम्मेदारी दी गई है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (2016) के अनुसार बिहार की प्रजनन दर 3.3 है। अर्थात राज्य में प्रति महिला बच्चों की औसत संख्या 3.3 है। उपलब्ध संसाधन और अन्य कई कारणों से प्रजनन का यह दर अधिक है। प्रजनन दर कम होने से महिला का स्वास्थ्य बेहतर होगा, मातृ मृत्युदर कम होगी और जनसंख्या स्थिरीकरण का कार्य भी होगा। कम उम्र में प्रजनन या अधिक प्रजनन से जच्चा की मातृ मृत्यु की दर भी अधिक होती है।
सासाराम सदर अस्पताल के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डा. कामेश्वरनाथ तिवारी के अनुसार, जिले में अंतरा एवं छाया की शुरुआत होने से महिलाओं द्वारा गर्भ निरोधक साधन के इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई है। इन दोनों गर्भ निरोधक साधनों के लिए आशा और एएनएम को प्रशिक्षण दिया गया है। इसमें लाभार्थी और प्रेरक दोनों को प्रोत्साहन राशि की व्यवस्था की गई है। अंतरा गर्भ निरोधक इंजेक्शन है, जिसे एक या दो बच्चों के बाद गर्भ समय का अंतर रखने के लिए दिया जाता है। यह इंजेक्शन साल में चार बार दिया जाता है। जबकि छाया गर्भ निरोधक टेबलेट है, जिसका सेवन हर चार दिन में करना होता है और एक महीने तक यह टेबलेट खानी होती है। अंतरा इंजेक्शन पर लाभार्थी को 100 रुपये और प्रेरक को भी 100 रुपये दिए जाने का प्रावधान है।
डा. कामेश्वरनाथ तिवारी के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (4) से यह जानकारी सामने आई है कि 16 से 49 साल के आयु वर्ग में 9.2 प्रतिशत महिलाएं ही गर्भ निरोधक साधन का इस्तेमाल करती हैं और केवल 0.3 प्रतिशत महिला ही गर्भ निरोधक गोली का इस्तेमाल करती हैं। नसबंदी कराने के मुकाबले गर्भ निरोधक साधन का उपयोग आसान है। इसका सफल परिणाम नव दंपति की जागरुकता और सही जानकारी के आधार पर पाया जा सकता है। पहले बच्चे के जन्म के बाद दूसरे बच्चे के लिए कम-से-कम दो साल का अंतराल मां के बेहतर स्वास्थ्य के अनुकूल होता है। ऐसा बच्चा (शिशु) के स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर और जरूरी है। समय के अंतराल से महिला का शरीर पुन: मां बनने और स्वस्थ शिशु पैदा करने के अनुकूल हो जाता है।

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