यूजीसी रेगुलेशन के शोर में दबा बड़ा सवाल: जीरो परसेंटाइल पर पीजी मेडिकल डिग्री!

Sushil Upadhyay

देहरादून। यूजीसी के समता (इक्वलिटी) रेगुलेशन को लेकर देशभर में चल रहे तीखे विरोध और राजनीतिक शोरगुल के बीच नीट पीजी 2025 में कटऑफ को शून्य और कुछ मामलों में माइनस परसेंटाइल तक घटाए जाने जैसा गंभीर मुद्दा हाशिये पर चला गया। यह निर्णय न केवल मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि अब शून्य योग्यता वाले उम्मीदवार भी मेडिकल की पीजी डिग्री के पात्र बन सकते हैं।

राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान बोर्ड द्वारा देश के मेडिकल कॉलेजों में हजारों सीटें खाली रहने का हवाला देते हुए नीट पीजी के परसेंटाइल में किया गया यह अभूतपूर्व बदलाव सामने आते ही मीडिया में चर्चा का विषय बना। उम्मीद की जा रही थी कि सरकार इस पर कोई स्पष्ट और ठोस निर्णय लेगी, ताकि यह धारणा न बने कि अयोग्य डॉक्टरों को भी विशेषज्ञ डिग्री दी जा रही है। लेकिन यूजीसी के इक्वलिटी रेगुलेशन के विरोध में उठे शोर ने इस मुद्दे को पूरी तरह नेपथ्य में धकेल दिया।

यह सवाल भी लगभग अप्रासंगिक कर दिया गया कि एक एमबीबीएस पास अभ्यर्थी, जो पीजी एंट्रेंस परीक्षा में शून्य या माइनस अंक प्राप्त करता है, आखिर वह डॉक्टर बनने की न्यूनतम बौद्धिक कसौटी पर कैसे खरा उतरता है? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह कि ऐसे अंकों के आधार पर उसे पीजी मेडिकल डिग्री में प्रवेश कैसे दिया जा सकता है।

दविशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे मामले को समझने के लिए दो पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। पहला, परसेंटाइल सिस्टम स्वयं में भ्रम पैदा करता है। परसेंटाइल यह नहीं बताता कि किसी अभ्यर्थी ने कितने प्रतिशत अंक हासिल किए हैं, बल्कि यह बताता है कि वह परीक्षा देने वालों में कितनों से आगे है। यदि पूरी बैच का प्रदर्शन कमजोर हो, तो उच्च परसेंटाइल पाने वाला अभ्यर्थी भी वास्तविक अंकों में बेहद कमजोर हो सकता है।

दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि जीरो परसेंटाइल का निर्णय वास्तव में किसके हित में है? सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पहले से ही तीव्र प्रतिस्पर्धा है, जहां आरक्षित वर्ग के छात्रों को भी ऊंची मेरिट के आधार पर ही प्रवेश मिलता है। स्पष्ट है कि परसेंटाइल शून्य होने से सरकारी कॉलेजों में प्रवेश की कोई संभावना नहीं बनती।

असल लाभ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों को मिलता है, जहां फीस इतनी अधिक है कि एक सामान्य परिवार, यहां तक कि ग्रुप-ए अधिकारी भी अपने बच्चे को पीजी मेडिकल डिग्री दिलाने में असमर्थ हो सकता है। ऐसे में शून्य परसेंटाइल पर प्रवेश पाने वाले अधिकांश छात्र वही होंगे, जो पहले भी प्राइवेट कॉलेजों से जैसे-तैसे एमबीबीएस कर चुके हैं और जिनके परिवार सालाना 20–30 लाख रुपये या उससे अधिक फीस चुकाने में सक्षम हैं।यह स्थिति एक बार फिर यह प्रमाणित करती है कि मेडिकल शिक्षा में योग्यता से अधिक निर्णायक तत्व अब आर्थिक क्षमता बन चुकी है। नतीजतन, लोअर और लोअर-मिडिल क्लास के प्रतिभाशाली युवाओं के लिए मेडिकल की पीजी डिग्री एक असंभव सपना बनती जा रही है।

चिंताजनक यह भी है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के कुछ पदाधिकारियों द्वारा इस निर्णय का स्वागत किया गया। जिस संस्था से चिकित्सा पेशे की गरिमा, नैतिकता और गुणवत्ता की रक्षा की अपेक्षा की जाती है, उसका इस तरह के निर्णयों के समर्थन में खड़ा होना गंभीर सवाल खड़े करता है।बार-बार यह तर्क दिया जा रहा है कि देश में डॉक्टरों की कमी है और इसलिए मेडिकल सीटें खाली नहीं छोड़ी जानी चाहिए। जबकि सच्चाई यह है कि भारत में अब डब्ल्यूएचओ के मानकों से अधिक डॉक्टर उपलब्ध हैं और सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। असली चुनौती संख्या नहीं, बल्कि गुणवत्ता और समान अवसर की है।

यदि मेडिकल शिक्षा को उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप बनाए रखना है, तो प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस पर सख्त नियंत्रण और खाली सीटों पर सरकारी कोटा बढ़ाने जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना होगा। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और योग्य लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को अवसर मिल सकेगा।

अंततः यह याद रखना जरूरी है कि कम फीस में पढ़े सरकारी मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों से ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की उम्मीद की जा सकती है। करोड़ों रुपये खर्च कर पढ़े डॉक्टरों से कम वेतन पर सरकारी सेवा की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। ऐसे में मेडिकल पेशे की पवित्रता और “डॉक्टर को भगवान” मानने की अवधारणा गहरे संकट में दिखाई देती है।

— डॉ. सुशील उपाध्याय

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