कंवर झील की पारिस्थितिकीय समृद्धि को समझने में जुटे कृषि वैज्ञानिक — संरक्षण की दिशा में बड़ी पहल

पटना- कार्यालय प्रतिनिधि। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के वैज्ञानिकों ने बिहार की प्रसिद्ध कंवर झील की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का विस्तृत अध्ययन प्रारंभ किया है। यह झील न केवल देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक आर्द्रभूमियों में से एक है, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका और पर्यावरणीय संतुलन की आधारशिला भी है।

कंवर झील मानव समाज को अनेक प्रकार की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करती है, जिनमें प्रमुख हैं —मत्स्य पालन, कृषि फसल उत्पादन, सिंचाई, जलीय पौधों की कटाई, पशुओं को पानी पिलाना, भूजल पुनर्भरण, जल शोधन और पर्यटन।यह झील बेगूसराय जिले के ग्रामीण समुदायों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।हालाँकि, मानवजनित दबाव, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण कंवर झील के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। इसके बावजूद, स्थानीय मछुआरे पारंपरिक जाल, फंदा और बंशी जैसी तकनीकों से मछलियाँ पकड़ते हैं। झील में कतला, रोहू, चन्ना, सिंघी, पुंटियस, चंदा, झींगा और पिला ग्लोबोसा जैसी कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह झील अनेक मछलियों के प्रजनन केंद्र के रूप में भी जानी जाती है।

मत्स्य पालन के अतिरिक्त, कंवर झील देशी और प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास स्थल है।यहाँ कमल, नीलकमल, जल लिली और नरकट (अरुंडो डोनैक्स) जैसे पौधे इसकी प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ाते हैं।यह दृश्य पर्यटकों को कश्मीर की डल झील जैसी अनुभूति देता है। वर्तमान में यहाँ प्रतिदिन लगभग 2000 पर्यटक नौकायन और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने आते हैं।

कंवर झील के पारिस्थितिकीय महत्व को ध्यान में रखते हुए, पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के वैज्ञानिक —डॉ. विवेकानंद भारती, डॉ. रचना दुबे, डॉ. कीर्ति सौरभ और डॉ. तारकेश्वर कुमार — ने झील की पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के मूल्यांकन हेतु जल, मिट्टी, जलीय पौधों और मछली की जैव विविधता सर्वेक्षण प्रारंभ किया है।यह अध्ययन चार प्रमुख पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं — प्रावधान सेवाएँ, विनियमन सेवाएँ, सांस्कृतिक सेवाएँ और सहायक सेवाएँ — पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य झील के सतत प्रबंधन, संरक्षण जागरूकता और नीति निर्माण में वैज्ञानिक सहयोग प्रदान करना है।इस शोध कार्य में शुकुन वाटिका के संस्थापक और एकम्भा पंचायत के कृषि सलाहकार श्री अनीश कुमार का भी उल्लेखनीय योगदान मिल रहा है। यह पूरा अध्ययन पूर्वी अनुसंधान परिसर के निदेशक डॉ. अनुप दास के मार्गदर्शन में संचालित किया जा रहा है।

यह पहल बिहार की प्राकृतिक आर्द्रभूमियों के संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के सतत विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। कंवर झील का संरक्षण न केवल जैव विविधता के लिए आवश्यक है, बल्कि यह बिहार के पारिस्थितिकी संतुलन और पर्यावरणीय सुरक्षा का भी आधार है।

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