सारण-वैशाली में बाढ़ से फसलों को भारी नुकसान, वैज्ञानिकों ने किया प्रारंभिक आकलन

पटना/सारण। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के वैज्ञानिकों की बहुविषयक टीम ने मंगलवार को सारण और वैशाली जिलों के बाढ़ प्रभावित गांवों का क्षेत्रीय दौरा कर कृषि एवं बागवानी फसलों को हुए नुकसान का प्रारंभिक आकलन किया। टीम ने गंगा और गंडक नदियों के बाढ़ के पानी से फसलों तथा कुछ हद तक पशुधन पर पड़े प्रभाव का जायजा लिया।

संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास के मार्गदर्शन में वैज्ञानिक डॉ. अजय कुमार, डॉ. रोहन कुमार रमण और डॉ. राकेश कुमार ने प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया। टीम ने खेतों में जलभराव की अवधि, पानी की गहराई और फसलों की मौजूदा स्थिति के आधार पर नुकसान का प्रारंभिक आकलन किया।

सारण में सब्जी फसलों को 100 प्रतिशत तक नुकसान

सारण जिले के हसनपुर, गोपालपुर और रसूलपुर गांवों में धान, मक्का, भिंडी, नेनुआ और लौकी की फसलों का निरीक्षण किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, 10 से 15 दिनों तक चार से पांच फीट पानी में डूबी रहने के कारण सब्जी फसलों को गंभीर से पूर्ण क्षति हुई है। प्रारंभिक आकलन में इन फसलों में नुकसान 100 प्रतिशत तक पाया गया।

मक्का की फसल में खेत की स्थिति के आधार पर करीब 60 से 90 प्रतिशत तक नुकसान देखा गया। वहीं, एक से दो फीट तक पानी जमा रहने वाले धान के खेतों में पौधों की संख्या कम और असमान पाई गई। इससे संभावित उपज में कमी का संकेत मिला है।

वैशाली में केले की फसल प्रभावित

वैशाली जिले के अकिलाबाद और बकापुर गांवों में मुख्य रूप से केले की खेती की जाती है। यहां दो से चार फीट तक पानी 12 से 18 दिनों तक जमा रहने से केले के पौधों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। लंबे समय तक जलभराव के कारण पौधों की वृद्धि, फलों के आकार, घौद के वजन और बाजार योग्य उपज में कमी आने की आशंका है।

जिन केले के बागानों में अधिक नुकसान हुआ है, वहां पौधों और जड़ों की स्थिति का आकलन करने के बाद दोबारा पौधारोपण की आवश्यकता पड़ सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, लीची के पेड़ कुछ अवधि तक जलभराव को सहन कर सकते हैं।

विस्तृत सर्वेक्षण के बाद स्पष्ट होगी क्षति

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि यह अभी प्रारंभिक क्षेत्रीय आकलन है। फसलों और किसानों को हुए वास्तविक नुकसान का विस्तृत आकलन करने के लिए प्रभावित खेतों का व्यापक सर्वेक्षण जरूरी है। जलभराव की अवधि, पानी की गहराई, फसल की अवस्था और खेत की स्थिति जैसे कारकों को ध्यान में रखकर ही अंतिम क्षति का आकलन किया जा सकेगा।

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