
हिंदू धर्म में गीता जयंती का महोत्सव अत्यंत पवित्र और गौरवपूर्ण माना जाता है। मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे मोक्षदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, उस दिव्य तिथि का स्मरण कराती है, जब धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की विराट युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन, धर्म और कर्तव्य का अद्वितीय संदेश प्रदान किया।
युद्ध के मध्य उत्पन्न यह अनोखा संवाद आगे चलकर श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में समस्त विश्व को आध्यात्मिकता, सत्य और कर्मयोग के शाश्वत मार्ग की ओर अग्रसर कर रहा है। यही कारण है कि यह तिथि केवल एक स्मरण मात्र नहीं, बल्कि ज्ञानावतरण का दिव्य उत्सव है।
गीता : सनातन संस्कृति की आधारशिला
आगामी 01 दिसंबर, सोमवार को मार्गशीर्ष (अग्रहण) शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर श्रीमती भगवती गीता जी के 52वें अवतरण महोत्सव का आयोजन किया जाएगा। कुरुक्षेत्र में कौरव-पाण्डव सेनाओं के मध्य भगवान वासुदेव श्रीकृष्ण के मुखारविंद से प्रकट इस दिव्य ज्ञान ने मानवता को नया दृष्टिकोण प्रदान किया।
श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं बल्कि सनातन संस्कृति का आचार-संहिता, जीवन का सर्वोत्तम मार्गदर्शक और अमर ज्ञानकोष मानी जाती है।
यह हर व्यक्ति को जीने की कला सिखाती है और लोक-परलोक दोनों के कल्याण का श्रेष्ठ मार्ग प्रशस्त करती है।
विश्व में गीता की सर्वश्रेष्ठ प्रतिष्ठा
विश्व भर में गीता को सार्वभौमिक ज्ञान का स्रोत माना जाता है।
पहले ही 36 भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है और आज भी विद्वान इसके अमृत तत्व को नई दृष्टि से प्रस्तुत कर रहे हैं। यह निरंतर बदलते युगों में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी युद्धभूमि में अर्जुन के लिए थी।
जगद्गुरु श्रीकृष्ण ने शोकाग्नि से तपते अर्जुन को जो उपदेश दिया, वही आज संपूर्ण मानव जाति को कर्तव्य, सदाचार और आध्यात्मिक उत्कर्ष की राह दिखा रहा है।
गंगा और गीता — दोनों मोक्षदायिनी
शास्त्रों में कहा गया है—
“एक चरण से गंगा और मुख से गीता निकली — दोनों उद्धार करने वाली हैं।”
जैसे गंगा जल तन का शुद्धिकरण करती है, वैसे ही गीता आत्मा को शुद्ध कर मोक्ष का मार्ग सुगम बनाती है।
प्रस्तुति : गुरुदेव आचार्य पं० लालमोहन शास्त्री







