छठ पूजा का शुभारंभ नहाय-खाय से, सूर्य आराधना और लोक परंपरा में डूबा पूरा बिहार

डेहरी-आन-सोन (रोहतास)- कार्यालय प्रतिनिधि। चार दिवसीय आस्था और सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा आज शनिवार से नहाय-खाय के साथ विधिवत शुरू हो गया। ग्रामीण से लेकर शहरी इलाकों तक श्रद्धा और भक्ति का माहौल दिखाई दे रहा है। श्रद्धालु महिलाएं छठी मैया की पूजा-अर्चना की तैयारियों में पूरी निष्ठा से जुटी हैं।

घर-घर में छठी मैया के पारंपरिक गीतों की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा है। व्रती पूजा सामग्रियों और बर्तनों की साफ-सफाई में व्यस्त हैं, वहीं बच्चे और युवा घरों की सजावट और स्वच्छता में योगदान दे रहे हैं।

आस्था के इस पर्व का एक महत्वपूर्ण पहलू स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण भी है। छठ पूजा के दौरान लोग अपने घरों, गलियों और घाटों की सफाई पर विशेष ध्यान देते हैं। इस अवसर पर शहरों में काम करने वाले लोग भी अपने गांव लौट आए हैं ताकि परिवार के साथ सूर्य भगवान की आराधना कर सकें।बाजारों में पूजन सामग्री की खरीदारी को लेकर जबरदस्त चहल-पहल देखी जा रही है। सूप, दउरा, पीतल के कलश, मिट्टी के दीये और पूजा के वस्त्रों की जमकर खरीदारी हो रही है। बढ़ती महंगाई के बावजूद श्रद्धालु पूजा सामग्री की खरीद में पीछे नहीं हैं। शहर के डेहरी बाजार, स्टेशन रोड, एकता चौक, पुराना बाजार, जैसे इलाकों में भारी भीड़ देखी जा रही है, जबकि ग्रामीण बाजारों में भी दिनभर लोगों की आवाजाही बनी रही।

छठ पूजा का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी जब कुंती पुत्र कर्ण सूर्य देव की आराधना कर शक्तिशाली बने थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार सीता माता ने रामराज्य की स्थापना के बाद अयोध्या में सूर्य देव की उपासना की थी, जिसके बाद यह परंपरा जन-जन में प्रचलित हो गई।

छठ पूजा में सूर्य देव और छठी मैया (ऊषा देवी) की उपासना की जाती है। सूर्य को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना गया है, इसलिए व्रती उनके प्रति आभार और समर्पण प्रकट करते हैं। यह पर्व पारिवारिक एकता, पर्यावरणीय संतुलन और अनुशासन का प्रतीक है।

चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में क्रमशः नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के माध्यम से सूर्य भगवान की आराधना की जाती है। व्रती कठिन नियमों का पालन करते हुए जलाशयों और नदियों के किनारे व्रत संपन्न करते हैं।

छठ पूजा न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है बल्कि यह स्वच्छता, अनुशासन, परिवारिक एकता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है। यह पर्व भारतीय लोक संस्कृति की जड़ों से जुड़ा हुआ है और सामाजिक समरसता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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