जीवित्पुत्रिका व्रत 14 सितंबर को: मातृत्व, उपवास और संतान के सुख-समृद्धि की परंपरा

डेहरी-आन-सोन (रोहतास) -कार्यालय प्रतिनिधि। इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत (जीउतिआ पर्व) 14 सितंबर रविवार को मनाया जाएगा। आचार्य पं. लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि इस पर्व को लेकर लोगों में तिथि को लेकर भ्रम बना हुआ है। कुछ लोग उदया तिथि नवमी के साथ व्रत करने की सलाह दी जा रहे हैं। परंतु उत्तर प्रदेश और बिहार से प्रकाशित प्रमुख पंचांगों ने एकमत होकर निर्णय किया है कि यह पर्व 14 सितंबर (रविवार) को ही मनाया जाएगा।

आचार्य पं. लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि धार्मिक परंपरा और पंचांग गणना के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी को ही जीवित्पुत्रिका व्रत सर्वोचित है। माताएँ अपने पुत्र की दीर्घायु, सुख और समृद्धि की कामना करते हुए इस दिन निर्जला उपवास रखती।

उन्होंने बताया कि अष्टमी तिथि 14 सितंबर को सुबह 08:41 बजे प्रारंभ होकर 15 सितंबर सोमवार को सूर्योदय से पूर्व 06:47 बजे तक रहेगी। चूँकि सूर्योदय (05:54 बजे) के बाद अष्टमी मात्र 1 घंटा 3 मिनट रहेगी, इसलिए धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत 14 सितंबर को ही करना उचित है। व्रत का पारण नवमी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाएगा। नवमी 15 सितंबर (सोमवार) को सुबह 06:27 बजे से शुरू होकर 16 सितंबर (मंगलवार) को रात्रि 04:24 बजे समाप्त होगी।

नहाय-खाय 13 सितंबर ( शनिवार) पांच बजे स्नान कर परम्परा के अनुसार सात्विक भोजन किया जाएगा। इसके बाद,शेष रात्रि चार बजे ओठगन देना चाहिये। अपने पुत्रों को खाने के लिए पुआ ठेकुआ को कलश के सहारे खड़ा किया जाता है। जब माताएं स्वयं भोजन करती है, इसे सरगही कहा जाता है। उपवास के दिन माताएँ 24 घंटे का निर्जला उपवास रखेंगी। इस दौरान तृण (खर) तक मुंह में नहीं लगाते, इसलिए इसे “खर जीतिआ” भी कहा जाता है। दूसरे दिन, प्रातः 05:54 बजे के बाद नवमी तिथि में परंपरानुसार व्रती पारण करेंगी, जिसे “जई खोटना” कहा जाता है। यह पर्व माताओं द्वारा अपने पुत्र की दीर्घायु और मंगलकामना के लिए अत्यंत श्रद्धा एवं आस्था से किया जाता है।

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