
बिहार और झारखंड में 03 सितम्बर (बुधवार) को करमा एकादशी व्रत मनाया जाएगा। यह पर्व कृषि और भाई बहनों के स्नेह का पर्व है, जो भाद्रपक्ष शुल्क एकादशी को मनाया जाता है। बहनें भाईयों के दीर्घायु और सुख समृद्धि के लिए उपवास रखती है। करम वृक्ष की टहनी को करम देवता का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है। साथ ही प्रकृति और अच्छी फसल की कामना की जाती है। यह पर्व प्रकृति, कृषि और मानव श्रम के महत्व को भी सीखाता है। इसे पद्मा एकादशी भी कहा जाता है।
आचार्य पंडित लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि प्रकृति पर्व करमा का अपना एक विशेष महत्व है। करमा एकादशी का प्रथम पालन किसान द्विज शर्मा के पुत्र कर्मा ने ऋषि के आदेश पर किया था। अच्छे कर्म और श्रद्धा के फलस्वरूप उसे धन-धान्य की प्राप्ति हुई और दाम्पत्य जीवन सुखमय बना। यही कारण है कि इसे कर्म करने की प्रेरणा देने वाला व्रत कहा गया है।
बहनें करती हैं भाई की दीर्घायु की कामना :-
इस दिन विशेष रूप से बहनें अपने भाई की शीतलता, नम्रता और दीर्घायु की कामना करते हुए झार की पूजा करती हैं। मगध परंपरा में झार की विधिवत पूजा का विशेष महत्व है। वहीं झारखंड में कदम की डाली स्थापित कर पूजा की जाती है। इस अवसर पर साग-पात से बने शीतल पेय और विभिन्न खाद्य पदार्थों का उपयोग किया जाता है।
पारण और विशेष नियम :-
करमा एकादशी का पारण 04 सितम्बर (गुरुवार) प्रातः 05:46 बजे के बाद किया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार सावन में साग, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, दाल और मठ्ठा का सेवन निषेध माना गया है।पारण के दिन बेलोघर साग, करमी (जल साग), दही, चीनी का शरबत, वासी भात, दाल, कढ़ी-बरी आदि का सेवन किया जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन घर में झाड़ू-पोंछा नहीं लगाया जाता और चूल्हा भी प्रातः नहीं जलाया जाता। सन्ध्या काल में भोजन निर्माण की परंपरा है।
वामन द्वादशी का भी उत्सव :-
करमा एकादशी के अगले दिन वामन द्वादशी भी मनाई जाती है, जो भगवान विष्णु के वामन अवतार का स्मरण दिवस है।
करमा पर्व से जुड़ी कई कहानियां :-
पंडित लाल मोहन शास्त्री ने बताया कि मगध में झुर की पूजा की जाती है। नवविवाहिता महिलाएं ससुराल का वस्त्र पहनकर झुर पूजन करतीं हैं। एक कथा के अनुसार दिव्ज शर्मा नामक ब्राह्मण के कर्मा एवं धर्मा दो पुत्र थे। दोनों पुत्रों को अलग अलग हिस्सा देकर वे स्वर्गवासी हो। धर्मा अपनी पत्नी के सहयोग से धन सहित की वृद्धि करने लगा, परंतु कर्मा की पत्नी के आलस्य जीवन व्यतीत करने के कारण उसकी स्थिति खराब हो गई। धर्मा के यहां जब धान की पहली रोपनी शुरू हुई तो उसने बिहन उखाड़ा था। सभी मजदूरों को भोजन कराया, लेकिन छोटे भाई को नहीं कराया जिस कारण करमा रात में खेत में जाकर रोपा हुआ धान उखाड़ने लगा, उसी दौरान धान से आवाज आई कि तुम अपने कर्म को खोजो तुम्हारा कर्म एवं धर्म तुम्हारी पत्नी के कारण भाग गया। कर्मा अपने कर्म धर्म के खोज में निकल पड़ा और व्याकुल होकर जमुना किनारे बेहोश हो जाता है तभी एक ऋषि आकर कर्मा को कर्म धर्म देव का दर्शन कराते हैं। कर्म धर्म देव ने कहा कि भादो शुक्ल एकादशी को व्रत कर झुर की पूजा करने से तुम्हारा कर्म धर्म ठीक हो जाएगा। कर्मा की पत्नी ने विधिपूर्वक झुर की पूजा की फलस्वरुप अन्न धन सहित बढ़ने लगा।
प्रस्तुति : आचार्य पंडित लाल मोहन शास्त्री






