
(आलेख) जीएसटी का नया दौर: सरल कर ढांचा, आम आदमी और व्यवसाय को मजबूती : गोविंद मिश्रा

भारत की कर प्रणाली में हाल ही में जो बदलाव हुआ है, उसे केवल प्रशासनिक सुधार नहीं कहा जा सकता। यह बदलाव देश की अर्थव्यवस्था को सरल, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बनाने की लंबे समय से चली कोशिश का नतीजा है। केंद्र सरकार ने बहु-स्तरीय जीएसटी स्लैब को खत्म कर अब केवल दो दरें रखी हैं—5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। इस फैसले का असर न सिर्फ बड़े उद्योगों पर होगा, बल्कि छोटे दुकानदार, कारीगर, किसान और आम जनता भी इसका फायदा महसूस करेंगे।
इस बदलाव का सीधा असर आम लोगों की जेब पर दिखेगा। रोजमर्रा की ज़रूरी वस्तुएँ अब कम कीमत पर उपलब्ध होंगी। लेकिन इसका असली महत्व बड़े स्तर पर है—यह कदम भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करेगा और देश की आर्थिक गतिविधियों को गति देगा।
पहले जीएसटी का ढांचा बहुत जटिल था। 5%, 12%, 18% और 28% जैसी अलग-अलग दरों के कारण छोटे व्यापारी अक्सर उलझन में रहते थे। उदाहरण के लिए, अगर किसी ने बच्चों के कपड़े बेचे, तो यह तय करना मुश्किल होता था कि टैक्स 12% लगेगा या 18%। ऐसी उलझनें व्यवसायियों का समय और मेहनत दोनों बर्बाद करती थीं और विवादों को जन्म देती थीं।
अब केवल दो स्लैब होने से यह परेशानी खत्म हो गई है। छोटे दुकानदार हों या मंझोले उद्यमी, सभी के लिए टैक्स का हिसाब लगाना आसान हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे टैक्स अधिकारियों और व्यापारियों के बीच विवाद और टकराव कम होंगे।
निर्यातकों के लिए यह बदलाव किसी वरदान से कम नहीं है। पहले उत्तर प्रदेश के किसी बुनकर को अगर हैंडलूम कपड़ा विदेश भेजना होता था, तो टैक्स रिफंड के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता था। केरल के मसाला व्यापारी के लिए भी वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती थी क्योंकि टैक्स और रिफंड में देरी लागत बढ़ा देती थी। अब स्पष्ट और सरल कर दर होने से रिफंड तेज़ होगा, लागत घटेगी और भारतीय सामान विदेशों में और अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा।
छोटे उद्योग और कारीगर भी सीधे लाभान्वित होंगे। भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ एमएसएमई हैं, जो लगभग 30 प्रतिशत जीडीपी में योगदान देती हैं और 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देती हैं। लेकिन यह वर्ग सबसे अधिक टैक्स की जटिलताओं से जूझता था।
अब बदलाव से गुजरात का हीरा उद्योग, तमिलनाडु के कपड़ा क्लस्टर और महाराष्ट्र के चमड़ा उद्योग कम इनपुट लागत का लाभ उठाएंगे। ग्रामीण इलाकों में भी असर स्पष्ट रूप से दिखेगा। छत्तीसगढ़ के डोक्रा शिल्पकार और बिहार की महिला डेयरी सहकारी समितियां अब अपने उत्पाद कम टैक्स दर पर बेच पाएंगी और अधिक ग्राहकों तक पहुंच पाएंगी। इस बदलाव से उनके व्यवसाय में वृद्धि और आर्थिक आत्मनिर्भरता का रास्ता खुल गया है।
सरकार ने देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने, निर्यात को दोगुना करने और भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने में सरल कर प्रणाली की अहम भूमिका होगी। कश्मीर का केसर, मैसूर का रेशम, कोल्हापुरी चप्पल और महाराष्ट्र का अल्फांसो आम—इन पर कम टैक्स से भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते और प्रतिस्पर्धी होंगे। इससे पारंपरिक उत्पादों की मांग बढ़ेगी और भारत की वैश्विक पहचान मजबूत होगी।विदेशी निवेशक भी अब भारत की ओर अधिक आकर्षित होंगे। पहले वे अक्सर शिकायत करते थे कि भारत की कर प्रणाली जटिल है। सरल और स्पष्ट कर दर से उन्हें भरोसा मिलेगा कि भारत व्यापार के लिए आसान और सुरक्षित देश बन रहा है। यह कदम वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा। आज जब कंपनियाँ चीन के विकल्प तलाश रही हैं, भारत उनके लिए निवेश का एक आकर्षक और भरोसेमंद केंद्र बनकर उभर रहा है।
कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में मसाले, फल, कॉफी, मिर्च और आम जैसे उत्पादों पर कम टैक्स का सीधा लाभ किसानों को मिलेगा। इससे उत्पादों की बिक्री बढ़ेगी और निर्यात को भी प्रोत्साहन मिलेगा। उदाहरणस्वरूप, केरल की काली मिर्च और कॉफी, आंध्र प्रदेश की लाल मिर्च और महाराष्ट्र के आम विशेष रूप से लाभान्वित होंगे।
हैंडलूम, बुनाई, शॉल, पेंटिंग और शिल्प जैसे पारंपरिक उद्योगों में यह सुधार नई ऊर्जा भर सकता है। बिक्री बढ़ने के साथ-साथ ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। दरभंगा की मधुबनी पेंटिंग बनाने वाली महिला समूह और छत्तीसगढ़ के डोक्रा कारीगर पहले से ही इसका प्रत्यक्ष लाभ अनुभव कर रहे हैं।
स्टार्टअप्स और छोटे कारोबारियों के लिए टैक्स अनुपालन अब आसान होगा। इसका सीधा अर्थ है—कम खर्च और अधिक निवेश। बड़े उद्योग, जैसे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सेक्टर, भी इन बदलावों से लाभान्वित होंगे। उनकी आपूर्ति श्रृंखला अधिक सुचारू होगी और उत्पादन लागत घटेगी।
हालाँकि लाभ स्पष्ट हैं, चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती राज्यों की आय पर संभावित असर है। यदि टैक्स संग्रह घटता है, तो राज्यों को अतिरिक्त कर्ज लेना पड़ सकता है, जिससे उनके बजट पर दबाव बढ़ेगा। दूसरी बड़ी चुनौती डिजिटल ढाँचे की है। GSTN को इतना सक्षम बनाना होगा कि वह लाखों कारोबारियों का दबाव झेल सके और क्षेत्रीय भाषाओं में सेवाएँ प्रदान कर सके। अन्यथा छोटे व्यापारी फिर से डिजिटल अनुपालन की जटिलताओं में उलझ सकते हैं।
साथ ही, लॉबिंग और विशेष छूट की मांग का खतरा भी मौजूद रहेगा। यदि सरकार अपवाद देने लगेगी, तो सरलीकरण का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
यह सुधार केवल उद्योगपतियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम नागरिक भी इसका प्रत्यक्ष लाभ महसूस करेंगे। रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ें सस्ती होंगी, नए रोजगार अवसर बनेंगे और आर्थिक गतिविधियाँ गति पकड़ेंगी। कारीगर और किसान अपनी मेहनत का उचित मूल्य प्राप्त कर सकेंगे। नई फैक्ट्रियों के खुलने से रोजगार में वृद्धि होगी। यह बदलाव आम आदमी की थाली से लेकर उसकी जेब तक—हर स्तर पर असर डालेगा।
भारत लंबे समय से उस विरोधाभास से जूझता रहा है, जहाँ एक ओर देश बड़े सपने देखता है और दूसरी ओर नियम-क़ानून की जटिलताएँ उसकी गति रोक देती हैं। जीएसटी का यह नया स्वरूप उस अंतर को पाटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह केवल कर दरों में कटौती भर नहीं है, बल्कि भारत की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, छोटे व्यवसायों और MSME को सशक्त करने, किसानों और कारीगरों को आर्थिक स्वतंत्रता देने और देश को वैश्विक व्यापार में मज़बूत स्थिति दिलाने वाला निर्णायक कदम है। यदि इसे सही ढंग से लागू किया गया, तो विकास, निवेश और रोजगार के क्षेत्र में बड़ा उछाल देखने को मिलेगा।
यह सुधार भले ही स्पेस मिशन या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों जितनी सुर्ख़ियाँ न बटोर पाए, लेकिन भारत की आर्थिक यात्रा में यह दशक का सबसे असरदार कदम साबित हो सकता है।
(० लेखक और पत्रकार, समाज और राजनीति के विचारक हैं)






