
सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह की कविता : सावन की बहार
सावन की बहार
(काव्य तरंग गीत)
सावन की बहार, पड़े मखमली फुहार,
स्वर्ग-सा सुंदर लगे यह सारा संसार।
चारों तरफ हरियाली और खुशहाली है,
सजनी करे अपने साजन का इंतजार।
सावन की बहार…
नील गगन में बिजली चमके चमचम,
आंगन में पायल की गूंजे छमछम।
फूलों को चूम तितली उड़ती जाए,
प्रियतमा का नेह-निमंत्रण है स्वीकार।
सावन की बहार…
बीच में बहती है एक नदिया कलकल,
दो दिलों में मौसम ने मचाई हलचल।
तन-मन भीगे, आंखों से छलके प्यार,
सजनी इस पार और साजन उस पार।
सावन की बहार…
तोता मैना को सुनाए नए-नए तराने,
लेकिन आज मैना रानी बनाए बहाने।
पंख पसार वन में मोर नाचने लग गया,
कोयल ने सबको पीछे छोड़ा इस बार।
सावन की बहार…
ऊपर से कृपा बरसा रहे भोले भंडारी,
सावन की रिमझिम इस संसार पर भारी।
जिसकी कोई उपमा नहीं इस जग में,
दिया सावन ने वैसा अनुपम उपहार।
सावन की बहार…
संपर्क: सूबेदार कृष्णदेव प्रसाद सिंह, जयनगर (मधुबनी) बिहार/ नासिक (महाराष्ट्र) । फोन : 90117 77572
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