बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू

पटना। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के आईसीएआर–पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना में मंगलवार से “बिहार में दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियाँ” विषय पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। 10 से 12 मार्च तक चलने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को बिहार कृषि प्रबंधन एवं प्रसार प्रशिक्षण संस्थान (बामेती), पटना द्वारा प्रायोजित किया गया है।

कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों और प्रसार कर्मियों के ज्ञान एवं कौशल का विकास कर राज्य में दलहन उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना है।प्रशिक्षण कार्यक्रम में वैज्ञानिक फसल प्रबंधन, उन्नत तकनीकों के प्रयोग तथा दलहन की टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसमें बिहार के पाँच जिलों—पटना, औरंगाबाद, नालंदा, भोजपुर और गया से आए प्रसार कर्मी तथा किसान भाग ले रहे हैं। कुल 20 प्रतिभागियों में चार सहायक प्रौद्योगिकी प्रबंधक, एक प्रखंड प्रौद्योगिकी प्रबंधक, छह किसान सलाहकार और नौ प्रगतिशील किसान शामिल हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. अरविंद कुमार चौधरी के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने मुख्य अतिथि बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के निदेशक (अनुसंधान) डॉ. अनिल कुमार सिंह तथा प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि राज्य में दलहन उत्पादकता बढ़ाने के लिए किसानों और प्रसार कर्मियों की क्षमता निर्माण अत्यंत आवश्यक है। इससे उन्नत दलहन उत्पादन तकनीकों का तेजी से प्रसार संभव होगा।

मुख्य अतिथि डॉ. अनिल कुमार सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि बिहार में वर्तमान में लगभग चार लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दलहन की खेती की जा रही है। उन्होंने बताया कि गन्ना सहित अन्य फसलों के साथ अंतरफसली खेती के माध्यम से दलहन उत्पादन बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। साथ ही उन्होंने दलहन फसलों में मूल्य संवर्धन और कृषि उद्यमिता को अपनाने पर जोर दिया, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो सके।इस अवसर पर आईसीएआर–पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के कार्यकारी निदेशक डॉ. आशुतोष उपाध्याय ने कहा कि दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाना जरूरी है। उन्होंने गुणवत्तायुक्त बीज, संतुलित उर्वरक प्रयोग, कीट एवं जल प्रबंधन तथा वैज्ञानिक फसल प्रबंधन पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया।

सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार प्रभाग के प्रभागाध्यक्ष डॉ. उज्ज्वल कुमार ने कहा कि दलहन का सेवन छिलके सहित करना पोषण की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी है। उन्होंने धान–गेहूँ आधारित फसल प्रणाली में दलहन को शामिल कर फसल विविधीकरण बढ़ाने की आवश्यकता बताई। साथ ही किसान सहभागिता आधारित बीज उत्पादन, कीट प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन और मल्चिंग तकनीकों के महत्व पर भी प्रकाश डाला।

पशुधन एवं मात्स्यिकी प्रबंधन प्रभाग के प्रभागाध्यक्ष डॉ. कमल शर्मा ने कहा कि दलहन फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मृदा उर्वरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने किसानों के बीच दलहन खेती के लाभों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया।कार्यक्रम का संचालन डॉ. कुमारी शुभा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अभिषेक कुमार दुबे ने प्रस्तुत किया।

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