
(आलेख)
महिला शक्ति से बदल रही है बिहार की राजनीति
: गोविंद मिश्रा

बिहार की राजनीति इस बार अलग रंग में दिखाई दे रही है। वर्षों से यहाँ चुनावी बहसें जाति और समुदाय के इर्द-गिर्द घूमती रही थीं, लेकिन अब हवा बदल चुकी है। इस बार चर्चा का केंद्र महिला भागीदारी और उनका सशक्तिकरण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की डबल इंजन सरकार ने महिलाओं को योजनाओं और विकास का केंद्र बनाया है, जिसका असर अब हर गाँव और मोहल्ले तक पहुँच चुका है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आने वाले चुनाव में महिलाओं का समर्थन सरकार की वापसी की सबसे बड़ी ताक़त साबित हो सकता है।
गाँव की महिलाएँ पहले घर की चौखट तक ही सीमित थीं। उनकी दुनिया केवल रसोई और बच्चों तक सिमटी हुई थी। लेकिन ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ ने यह तस्वीर बदल दी। इस योजना के तहत शुरुआत में ₹10,000 की मदद दी जाती है और आवश्यकता पड़ने पर ₹2 लाख तक की आर्थिक सहायता भी मिलती है। अब तक 75 लाख से अधिक महिलाओं के खातों में ₹7,500 करोड़ से ज़्यादा की राशि पहुँच चुकी है।
इस योजना ने कई प्रेरक कहानियाँ गढ़ी हैं। ‘लखपति दीदी’ और ‘ड्रोन दीदी’ जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि महिला अपने दम पर परिवार की कमाई संभाल सकती है। कोई बकरी पालन कर रही है, तो कोई पोल्ट्री या आटा चक्की चला रही है। कहीं मिठाई की दुकान है, तो कहीं सिलाई का काम। दरभंगा की बेटियाँ और महिलाएँ भी अब अपने परिवार की ज़िम्मेदारी संभालने लगी हैं। गाँव में लोग कहते हैं—‘जहाँ महिला मजबूत होती है, वहाँ घर भी मजबूत होता है।’
महिला आरक्षण ने महिलाओं को नई पहचान और आत्मविश्वास दिया है। अब वे नौकरियों, पंचायतों और राजनीति में पहले से कहीं अधिक सक्रिय हैं। इसका सकारात्मक असर परिवारों पर भी दिख रहा है। महिलाएँ बच्चों की शिक्षा, पोषण और भविष्य की योजनाओं में खुलकर योगदान दे रही हैं। गाँव की चौपालों में अब पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की आवाज़ भी गूंजने लगी है।
डबल इंजन सरकार ने महिलाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को आसान बनाने के लिए कई कदम उठाए। उज्ज्वला योजना से रसोई में धुएँ का बोझ कम हुआ, जिससे महिलाओं का स्वास्थ्य सुधरा। प्रधानमंत्री आवास योजना से लाखों परिवारों को पक्के घर मिले। शौचालय और स्वच्छ पेयजल की सुविधा ने घर की गरिमा और स्वास्थ्य दोनों को बढ़ाया।
सरकार ने 125 यूनिट तक बिजली मुफ्त करने और पेंशन राशि ₹400 से बढ़ाकर ₹1,100 करने का निर्णय लिया। इससे घरेलू खर्च घटा और महिलाएँ अपने परिवार तथा छोटे व्यवसाय में निवेश करने में सक्षम हुईं। इन बदलावों ने महिलाओं को अपने सपनों में निवेश की स्वतंत्रता दी और उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्रदान किया।
शिक्षा के क्षेत्र में भी बिहार ने बड़ा बदलाव देखा है। साइकिल और यूनिफॉर्म योजनाओं ने लाखों लड़कियों को स्कूल तक पहुँचाया है। अब वे अपनी पढ़ाई पूरी कर उच्च शिक्षा और रोजगार के नए अवसर तलाश रही हैं। जीविका समूहों से जुड़कर महिलाएँ और बेटियाँ न केवल शिक्षा में आगे बढ़ रही हैं, बल्कि स्वरोजगार और छोटे व्यवसाय शुरू करके अपनी आजीविका को भी सशक्त बना रही हैं।
गाँव की वे बेटियाँ, जो पहले अंधेरे और अभाव में अपना बचपन बिताती थीं, अब बिजली की रोशनी में पढ़ाई कर रही हैं और अपने भविष्य की नई उड़ान भर रही हैं। उदाहरण के लिए, मुजफ्फरपुर की सीता कुमारी अपने छोटे कपड़े के व्यवसाय से पूरे मोहल्ले को रोजगार दे रही हैं। यही वजह है कि आज बिहार की बेटियाँ शिक्षा, व्यवसाय, समाज सेवा और राजनीति—हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं।
बिहार की पहचान केवल विकास योजनाओं से ही नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति से भी गहराई से जुड़ी है। मिथिलांचल के पुनौराधाम स्थित सीता मंदिर को राष्ट्रीय महत्व मिलने से इस क्षेत्र को नई पहचान मिली। जैसे अयोध्या का राम मंदिर पूरे देश की आस्था का केंद्र है, वैसे ही सीता मंदिर ने बिहार को माता सीता से जोड़ा है। महिलाएँ इसे गर्व के साथ अपनाती हैं और स्वयं को ‘सीता की बेटियाँ’ कहकर सम्मानित महसूस करती हैं।
यह सांस्कृतिक जागरूकता केवल आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पर्यटन, रोजगार और व्यापार को भी नई गति मिल रही है। मिथिलांचल के छोटे व्यवसाय, हस्तशिल्प और स्थानीय उद्योग इस बदलाव से लाभान्वित हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, दरभंगा की मधुबनी पेंटिंग बनाने वाली महिलाएँ अब अपने काम से न केवल घर चला रही हैं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बना रही हैं। गया की ‘जादूगरिया’ और जहानाबाद की मिट्टी के बर्तन बनाने वाली महिलाएँ भी अब अपने हुनर से रोजगार के साथ सम्मान कमा रही हैं।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि बिहार की राजनीति अब जातिगत समीकरणों से ऊपर उठकर विकास, सम्मान और महिलाओं की भागीदारी पर केंद्रित हो रही है। भाजपा और डबल इंजन सरकार का संदेश स्पष्ट है—बिहार की असली पहचान जातिगत राजनीति से नहीं, बल्कि आस्था, गर्व और विकास से बनती है।
महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण को शासन की प्राथमिकता बनाना सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। गाँव-गाँव की महिलाएँ अब अपने वोट को जाति के आधार पर नहीं, बल्कि विकास और आत्मसम्मान के आधार पर जोड़ रही हैं।
“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महिलाओं के साथ सीधा संवाद इस बदलाव की सबसे बड़ी ताक़त है। जब लाभार्थी महिलाएँ अपनी सफलता की कहानियाँ साझा करती हैं, तो सरकार और जनता के बीच विश्वास और गहरा होता है। पीएम मोदी बार-बार कहते हैं—‘महिला शक्ति ही भारत की असली ऊर्जा है’। बिहार की महिलाएँ हर दिन अपने संघर्ष और सफलता की कहानियों से इसे साबित कर रही हैं।
महिला शक्ति अब केवल घर संभालने तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज और राजनीति की दिशा तय करने वाली ताक़त बन चुकी है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आगामी चुनाव अब मंडल बनाम कमंडल या जातिगत ध्रुवीकरण तक सीमित नहीं रहेगा। इस बार विजन है—माता सीता और महिला शक्ति से एकजुट बिहार और सशक्त भारत। इस विजन की धुरी बिहार की महिलाएँ हैं।
आज बिहार बदल रहा है। महिलाएँ परिवार, समाज और राजनीति के हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रही हैं। उनका बढ़ता आत्मविश्वास और सक्रिय भागीदारी उन्हें निर्णायक मतदाता बना चुका है। यही कारण है कि राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आने वाले चुनाव में महिलाओं की भूमिका निर्णायक साबित होगी और यह डबल इंजन सरकार की वापसी की सबसे मजबूत वजह बनेगी।
बिहार की महिलाएँ अब केवल अपने घर और परिवार तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने समाज, राजनीति और विकास के रास्ते पर अपनी मजबूत छाप छोड़ दी है। उनके संघर्ष, मेहनत और सफलता की कहानी बिहार की राजनीति और विकास की नई दिशा तय कर रही है।
आज गाँव की चौपाल में यही चर्चा सुनाई देती है—‘जहाँ महिला मजबूत होती है, वहाँ समाज भी मजबूत होता है।’ यही बिहार की नई पहचान है।
(० लेखक और पत्रकार, समाज और राजनीति के विचारक हैं)






