
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही दान-पुण्य और स्नान का महापर्व मकर संक्रांति इस वर्ष 15 जनवरी को श्रद्धा और विधि-विधान से मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य आचार्य पंडित लालमोहन शास्त्री ने बताया कि सूर्यास्त के बाद संक्रांति होने और षटतिला एकादशी पड़ने के कारण शास्त्रानुसार अगले दिन पुण्य काल मान्य है।
आचार्य शास्त्री ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार यदि सूर्य संक्रांति सूर्यास्त के बाद होती है, तो उसका पुण्य काल अगले दिन माना जाता है। साथ ही एकादशी तिथि में खिचड़ी दान वर्जित होने के कारण भी 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाना उचित है। उन्होंने कहा कि 15 जनवरी, गुरुवार को प्रातः काल से दिन 1:29 बजे तक मकर संक्रांति जन्य पुण्य काल रहेगा।
उन्होंने बताया कि इस दिन भागीरथी गंगा, पुनपुना, सोनभद्र सहित अन्य नदियों, सरोवर, तालाब, कुआं अथवा नल जल से स्नान कर देव, ऋषि एवं पितरों का तर्पण करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस अवसर पर यथाशक्ति कंबल, लकड़ी, चूड़ा-दही, गुड़, तिलवा, तिलकूट, खिचड़ी, अन्न, सब्जी, नमक, तेल एवं घी का दान करने का विशेष महत्व है।
आचार्य शास्त्री ने कहा कि इन दानों से सूर्यदेव, शनिदेव, अन्य देवगण, ऋषि एवं पितर प्रसन्न होते हैं, जिससे अन्न, धन, संतान, वाहन और आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
उन्होंने मकर संक्रांति के आध्यात्मिक महत्व को बताते हुए कहा कि सूर्य नारायण अपने पुत्र शनिदेव के घर मकर राशि में लगभग 60 दिनों के लिए निवास करते हैं। पिता के आगमन पर पुत्र द्वारा किए गए सत्कार से सूर्यदेव प्रसन्न होकर सभी कामनाएं पूर्ण करते हैं। इसी पिता-पुत्र के पावन समागम के रूप में मकर संक्रांति का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।





