कम बारिश और बढ़ते तापमान के बीच किसानों के लिए कृषि परामर्श जारी

पटना। बिहार में मानसून की कमजोर स्थिति और आने वाले दिनों में तापमान में संभावित वृद्धि को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के वैज्ञानिकों ने किसानों के लिए आवश्यक कृषि परामर्श जारी किया है। परिसर के अनुसार, अगस्त के पहले 17 दिनों में राज्य में 111.3 मिमी वर्षा हुई, जो सामान्य से करीब 32 प्रतिशत कम है। जून की शुरुआत से अब तक मानसूनी वर्षा में लगभग 40 प्रतिशत की कमी बनी हुई है।

सीवान, खगड़िया और लखीसराय को छोड़कर राज्य के अधिकांश जिलों में वर्षा की स्थिति चिंताजनक है। जहानाबाद में सामान्य से 64 प्रतिशत और भागलपुर में 60 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार आने वाले दिनों में अधिकतम तापमान में 2-3 डिग्री सेल्सियस की क्रमिक वृद्धि हो सकती है। 19 से 24 अगस्त के बीच दक्षिण-मध्य और दक्षिण-पूर्व बिहार के कुछ स्थानों पर हल्की बारिश की संभावना है। 21 अगस्त को उत्तरी और दक्षिण-पश्चिमी जिलों में कई स्थानों पर मेघ गर्जन, वज्रपात और तेज हवा की संभावना जताई गई है।

खेत में नमी बनाए रखने पर जोर

वैज्ञानिकों ने किसानों को खेतों की मेड़ों की मरम्मत कर वर्षा जल को खेत में ही संचित करने, खेतों को खरपतवार-मुक्त रखने और पौधों की उचित संख्या सुनिश्चित करने की सलाह दी है। नमी की भारी कमी होने पर धान के अतिरिक्त कल्ले हटाने तथा मिट्टी की सतह पर हल्की दरारें दिखाई देने पर ही सिंचाई करने को कहा गया है।

धान में लगातार पानी भरकर रखने के बजाय वैकल्पिक गीला और सूखा (AWD) सिंचाई पद्धति अपनाने की सलाह दी गई है। खरपतवार नियंत्रण के लिए पलवार या कोनो-वीडर का उपयोग करने तथा धान की बुआई के 15-20 दिनों बाद, खरपतवार की 2-3 पत्ती अवस्था में बिस्पायरीबैक सोडियम आधारित खरपतवारनाशी के प्रयोग की सलाह दी गई है। धान की रोपाई के 50-55 दिनों बाद निकौनी करना भी लाभकारी बताया गया है।

पोषक तत्वों के नुकसान को कम करने की सलाह

किसानों को पोषक तत्वों के नुकसान को कम करने के लिए नीम-कोटेड यूरिया का उपयोग करने तथा साफ मौसम में सिंचाई के बाद हल्की नमी रहने पर यूरिया की टॉप-ड्रेसिंग करने की सलाह दी गई है। वर्षा की कमी से उत्पन्न सूखे या पोषण संबंधी तनाव से फसल को उबारने के लिए पत्तियों पर 2 प्रतिशत यूरिया या एनपीके (15:15:15) घोल का छिड़काव किया जा सकता है।

वर्षा जल संचयन और फसल निगरानी जरूरी

वैज्ञानिकों ने छतों पर वर्षा जल संचयन, तालाब निर्माण तथा टपक और फव्वारा सिंचाई जैसी प्रणालियों को अपनाने पर जोर दिया है। संचित जल सूखे जैसी परिस्थितियों में फसलों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। साथ ही, कीट एवं रोगों के संभावित प्रकोप से बचाव के लिए नियमित रूप से फसलों की निगरानी करने तथा कीट प्रबंधन के लिए फेरोमोन और स्टिकी ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है।

खाली खेतों में चारा फसल लगाने तथा ऊंचे खेतों या मेड़ों पर अरहर की बुआई करने की सलाह भी दी गई है। वैज्ञानिकों ने किसानों से मौसम की परिस्थितियों के अनुसार कृषि कार्यों में बदलाव करते हुए उपलब्ध जल एवं मिट्टी की नमी का बेहतर प्रबंधन करने की अपील की है।

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