
मन्नत पूरी होने पर मां की सेवा का संकल्प लेते हैं श्रद्धालु
डेहरी -ऑन -सोन (रोहतास)- सोनमाटी ब्यूरो। बिहार के नवादा जिले के पकरीबरावां प्रखंड की ढोढा पंचायत के रेवार गांव स्थित मां महाशक्ति मंदिर श्रद्धा, भक्ति और अनूठी धार्मिक परंपरा का विशिष्ट केंद्र है। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा बनवाने और शारदीय नवरात्र की पूजा का संपूर्ण खर्च उठाने के लिए श्रद्धालुओं में ऐसी होड़ रहती है कि वर्ष 2045 तक की बुकिंग पूरी हो चुकी है। मन्नत पूरी होने पर मां के दरबार में सेवा का संकल्प लेने वाले श्रद्धालुओं को अपनी बारी के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। प्रतिमा निर्माण के लिए दशकों पहले से नंबर दर्ज कराने की यह परंपरा मंदिर को क्षेत्र के प्रमुख आस्था केंद्रों में विशेष पहचान दिलाती है।
डेहरी ऑन सोन निवासी एवं वर्मा प्रिंटिंग प्रेस के संस्थापक वरुण कुमार वर्मा के पैतृक गांव रेवार स्थित इस मंदिर में शारदीय नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। नवरात्र के पहले दिन मंदिर परिसर में एक हजार दीप जलाकर मां दुर्गा का स्वागत किया गया। दीपों की रोशनी से मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठा। वहीं, करीब 30 महिला व्रती मंदिर परिसर में रहकर दिन-रात पूजा-अर्चना और आराधना में जुटी हैं। नवरात्र के दौरान यहां आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
1923 में हुई थी मंदिर की स्थापना, 2015 में जीर्णोद्धार
रेवार गांव के प्रवेश द्वार पर स्थित मां महाशक्ति मंदिर की स्थापना वर्ष 1923 में हरसहाय लाल ने एक छोटे मंदिर के रूप में की थी। समय के साथ मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई और इसका विस्तार होता रहा। इसके बाद वर्ष 2015 में मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया गया। वर्तमान में यहां प्रत्येक वर्ष शारदीय नवरात्र के अवसर पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र के दिनों में मंदिर परिसर धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन जाता है।

1995 से शुरू हुई प्रतिमा निर्माण के लिए नंबर लगाने की परंपरा
मंदिर की सबसे खास परंपराओं में मां दुर्गा की प्रतिमा बनवाने और नवरात्र पूजा का संपूर्ण खर्च उठाने के लिए श्रद्धालुओं की प्रतीक्षा सूची शामिल है। पूजा समिति से जुड़े मुकेश कुमार सिन्हा के अनुसार, वर्ष 1995 से पहले प्रतिमा निर्माण और पूजा का खर्च आपसी सहयोग से जुटाया जाता था। बाद में श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर प्रतिमा निर्माण और नवरात्र पूजा का पूरा खर्च उठाने के लिए आगे आने लगे।
एक ही वर्ष में कई श्रद्धालुओं की ओर से यह जिम्मेदारी निभाने की इच्छा जताए जाने लगी तो पूजा समिति ने वर्ष 1995 से नंबर दर्ज करने की व्यवस्था शुरू की। इसके बाद श्रद्धालुओं को क्रमवार प्रतिमा निर्माण और पूजा का अवसर दिया जाने लगा। मुकेश कुमार सिन्हा के अनुसार, श्रद्धालुओं की बढ़ती आस्था का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब वर्ष 2045 तक के लिए नंबर बुक हो चुके हैं। इस परंपरा से जुड़ने के इच्छुक भक्तों को अपनी बारी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।
15 वर्षों के इंतजार के बाद अर्जुन यादव को मिला अवसर
इस वर्ष मां दुर्गा की प्रतिमा के निर्माण और नवरात्र पूजा का संपूर्ण खर्च रेहड़ी निवासी अर्जुन यादव उठा रहे हैं। उन्होंने वर्ष 2011 में इसके लिए अपना नंबर दर्ज कराया था। करीब 15 वर्षों के इंतजार के बाद इस वर्ष उन्हें मां दुर्गा की प्रतिमा बनवाने और नवरात्र पूजा का पूरा खर्च वहन करने का अवसर मिला है।
मंदिर की इस परंपरा में श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर मां के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए पूजा और सेवा का संकल्प लेते हैं। इसके लिए उन्हें पहले से अपना नाम दर्ज कराना पड़ता है। श्रद्धालुओं की लंबी प्रतीक्षा सूची इस धार्मिक परंपरा के प्रति लोगों की गहरी आस्था और समर्पण को दर्शाती है।

महाष्टमी से शुरू होता है बलि का सिलसिला
मां महाशक्ति मंदिर की धार्मिक पहचान यहां निभाई जाने वाली पारंपरिक बलि प्रथा से भी जुड़ी है। स्थानीय जानकार मनीष कुमार वर्मा के अनुसार, शारदीय नवरात्र की महाष्टमी की रात जागरण के साथ बलि देने का सिलसिला शुरू होता है। सबसे पहले सरकारी बलि दी जाती है। इसके बाद दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर बलि अर्पित करते हैं।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, प्रत्येक वर्ष यहां 500 से 600 पाठों की बलि दी जाती है। इस परंपरा में शामिल होने के लिए भी श्रद्धालुओं को अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। महाष्टमी की रात होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों और जागरण में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
नाटक, मेला और जागरण की मची धूम
शारदीय नवरात्र के दौरान मां महाशक्ति मंदिर और आसपास के क्षेत्रों में उत्सव जैसा माहौल रहता है। इस अवसर पर तीन दिवसीय नाटक, सांस्कृतिक कार्यक्रम, भव्य जागरण और मेले का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों में आसपास के गांवों के साथ-साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु और दर्शक पहुंचते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक गतिविधियां इस आयोजन को सामुदायिक उत्सव का स्वरूप प्रदान करती हैं।
मां महाशक्ति मंदिर की स्थापना से लेकर वर्तमान तक चली आ रही धार्मिक परंपराएं इसे रेवार गांव ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के लिए भी महत्वपूर्ण आस्था केंद्र बनाती हैं। प्रतिमा निर्माण के लिए वर्ष 2045 तक बुकिंग पूरी होना इस मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास को दर्शाता है। मन्नत पूरी होने पर पूजा का संपूर्ण खर्च उठाने की परंपरा यहां आस्था को सामूहिक सहभागिता और सेवा से जोड़ती है। यही विशिष्ट परंपरा मां महाशक्ति मंदिर को क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है।




