
• देवी शोणाक्षी के पूजन- नमन के लिए उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
डेहरी-ऑन-सोन (रोहतास)। शारदीय नवरात्र प्रारंभ होते ही प्रतिपदा तिथि से डेहरी नगर के पाली स्थित देवी शोणाक्षी के मंदिर में पूजन व नमन के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। अहले सुबह से ही देवी के मंदिर में पूजा- अर्चना के लिए श्रद्धालु स्त्री- पुरुषों का जमघट शुरू हो जाता है। संध्या काल में भी घी के दीये जलाने के लिए हजारों की तादाद में भक्तों की भीड़ जुट रही है।
डेहरी नगर के सोन तट पर बसे अति प्राचीन बस्ती पाली के ईशान कोण पर अवस्थित देवी शोणाक्षी के मंदिर परिसर में श्रीदुर्गा पूजनोत्सव हेतु भव्य एवं आकर्षक पूजा पंडाल बनाया गया है। सांझ की वेला में झालर- बत्ती की रोशनी से पूरा मंदिर परिसर जगमगा उठता है। श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने करीब पुलिस बल की तैनाती की है, जिसमें कई महिला पुलिस कर्मी भी हैं। हालांकि मंदिर की प्रबंध समिति काली कला मंदिर के स्वंयसेवक भी भक्तों को नियंत्रित एवं निर्देशित करते हुए देखे जाते हैं।
नीम के पेड़ में देवी की देहाकृति
मंदिर परिसर में उगे पुराने नीम के पेड़ में देवी की सिर से पांव तक की पूरी देहाकृति उभरी हुई है। देवी के मुख को छोड़कर शेष हिस्सा साड़ी से ढंका रहता है। ध्यातव्य है कि पारंपरिक देवी गीतों में नीम के पेड़ में भगवती का वास बताया गया है, जो यहाँ साक्षात दिखाई देता है।
शोणाक्षी देवी की गाथा
शास्त्र में वर्णित है कि महानद शोणभद्र के तट पर भगवान श्रीहरि विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर देवी सती का दाहिना नितंब गिरा था। इसीलिए देवी शोणाक्षी के नाम से ख्यात हुईं। मध्यप्रदेश से प्रकाशित एक पुस्तक ‘हमारे पूज्य तीर्थ’ में डेहरी ऑन सोन में सोन तट पर शक्ति स्वरूपा देवी सती के दाहिने नितंब के कटकर गिरने का उल्लेख है। यह पुस्तक शहर के सिनेमा व्यवसायी दिवंगत विश्वनाथ प्रसाद सरावगी के निजी पुस्तकालय में रखी हुई है।

विदित हो कि डेहरी नगर में सबसे पुरानी बस्ती पाली है। इसकी संरचना भी यह बताती है कि यह अति प्राचीन गाँव है। पाली नाम भी प्राचीनता की पुष्टि करता है। ईसा पूर्व पांच सौ में प्रचलित पालि भाषा में गाँव को पल्ली कहा जाता था। उड़िया और दक्षिण भारत की द्राविड़ भाषाओं में भी गाँव के लिए पल्ली शब्द का प्रयोग होता है। पल्ली शब्द ही थोड़ा संशोधित होकर पाली हो गया है। शहर का सोन तटीय बस्ती शिवगंज मध्यकालीन है, क्योंकि शिव के साथ गंज जुड़ा है। जबकि मकराईन बस्ती की संरचना पुरानी बस्तियों सी नहीं है।
भक्तों- साधकों की बात
डेहरी नगर के पाली मोहल्ला के ईशान कोण पर अवस्थित शोणाक्षी देवी के बारे में पूरे नगरवासी यह मानते हैं कि यह एक जाग्रत देवी मंदिर है, जहाँ अलौकिक शक्ति का वास है। स्टेशन रोड के एक साधक अजीत कुमार ने बताया कि एक दिन उसने मेडिटेशन के दरम्यान जब नीम के पेड़ पर ध्यान केंद्रित किया, तो घने काले बाल दिखे। शेष हिस्सा नहीं देख सका, क्योंकि मेरा मेडिटेशन खत्म हो गया। पूरी कोशिश के बावजूद मैं पुनः ध्यानमग्न नहीं हो सका।
एक अन्य साधक ने अपना नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि उसने एक दिन स्वप्न देखा- लाल वस्त्र पहनी एक स्त्री कहीं से आयी और नीम के पेड़ में समा गई। फिर एक दिन सपने में देखा कि दो ब्राह्मण मंदिर को देख रहे हैं। एक ब्राह्मण बोला- यह तो शीतला माता का मंदिर है, लेकिन नीम के पेड़ में शक्ति का वास है।

कुछ स्थानीय भक्तों ने बताया कि शोणाक्षी देवी के इस मंदिर में डेहरी नगर के विभिन्न मोहल्ले के श्रद्धालुजन आकर पूजा- अर्चना करते हैं। यही कारण है कि हर वर्ष वासंती एवं शारदीय नवरात्र में मंदिर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।
तंत्र एवं लोक परंपरा की दृष्टि से यह मंदिर
इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन काल से बिहार, बंगाल और ओड़िशा मातृ ( देवी) पूजक प्रदेश रहा है। यही कारण है कि बिहार- झारखंड में हर मांगलिक अनुष्ठान/ कार्य में सबसे पहले देवी गीत गाने की परंपरा है।
तंत्र की दृष्टि से देवी काली दस महाविद्याओं में प्रथम और तारा द्वितीय हैं। देवी तारा का सुप्रसिद्ध मंदिर तारापीठ के नाम से जाना जाता है। सासाराम में भी देवी तारा का मंदिर है- ताराचंडी धाम। दस महाविद्याओं में छिन्नमस्तिका भी है, जिसका मंदिर रजरप्पा में दामोदर- भैरवी नदी के संगम पर अवस्थित है।
डेहरी नगर के पाली में अवस्थित मंदिर दस महाविद्याओं में प्रथम काली का है। इसीलिए स्थानीय जन इसे काली मंदिर कहते हैं और इसकी प्रबंध समिति का नाम काली कला मंदिर है। प्रबंध समिति हेतु यह नाम पाली के रामानंद ( साधु) ने सुझाया था।काली कला मंदिर प्रबंध समिति के सदस्यों ने बताया कि इस काली मंदिर में लोक परंपरा के तहत हर वर्ष चैत व श्रावणी पूर्णिमा को लोक विधि से देवी की पूजा होती है। इस पूजा में पाली बस्ती के हर घर की भागीदारी होती है।
इस संदर्भ में एक बुजुर्ग ने बताया कि पहले चैत्र या श्रावण में लोकविधि से होने वाली देवी की पूजा पाली की एक सेविका करती थी। अन्य ग्रामीण सहयोग करते थे। लोक विधि में वैदिक विधि- विधान का अनुसरण या अनुकरण नहीं किया जाता है और ना किसी ब्राह्मण पुरोहित की जरूरत पड़ती है। जैसे, बिहार के लोकपर्व छठ में किसी ब्राह्मण पुरोहित और वैदिक मंत्रों की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन, इधर कुछ दशकों से चैत व सावन में होने वाली पूजा में ब्राह्मण पुरोहित से भी पूजा और वैदिक मंत्रों से हवन भी कराया जा रहा है। मंदिर में हवन कुंड है, ताकि कोई व्यक्ति अन्य अवसरों पर मंत्रों के साथ हवन कर सके, लेकिन लोक विधि में मंत्रों का उपयोग नहीं होता है, खासकर वैदिक मंत्र। इससे पूजा का लोक स्वरूप विद्रूप हो जाता है।





