हिंदी दिवस पर कविता पाठ के साथ हिंदी की उपलब्धि और चुनौतियों पर चर्चा

डेहरी-ऑन-सोन (रोहतास)। नगर के कवियों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने हिंदी दिवस के अवसर पर ज़क्की बिगहा स्थित लाइट रेलवे कॉलोनी में डॉ. प्रदीप दुबे के आवास पर साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित कर हिंदी की समृद्धि, उपलब्धि, बढ़ते प्रभाव और वर्तमान चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मृत्युंजय कुमार भट्ट ने की। इस दौरान कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर हिंदी के प्रति प्रेम और साहित्यिक संवेदना को अभिव्यक्त किया।

कार्यक्रम में कवि-लेखक कुमार बिंदु, समाजसेवी संजय सिंह बाला, मिथिलेश दीपक, प्रो. महेंद्र गुप्ता, प्रो. अजीत कुमार, डॉ . निशांत राज सहित कवि, साहित्यकार और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। कविता पाठ के दौरान प्रेम, प्रकृति, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदना और समकालीन जीवन से जुड़े विषयों पर रचनाएं प्रस्तुत की गईं। कवियों की प्रस्तुतियों को श्रोताओं ने तालियों के साथ सराहा।

वक्ताओं ने हिंदी के विकास और बढ़ते वर्चस्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संवेदना, संस्कृति और जनजीवन से गहराई से जुड़ी भाषा है। साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, सिनेमा और डिजिटल माध्यमों के साथ इंटरनेट की दुनिया में भी हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ा है। हिंदी आज देश की सीमाओं से बाहर भी अपनी पहचान मजबूत कर रही है।

वहीं वक्ताओं ने हिंदी की कमजोरियों और चुनौतियों पर भी गंभीरता से चर्चा की। उन्होंने कहा कि व्यापक जनप्रयोग के बावजूद ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी शिक्षा, शोध और आधुनिक विषयों की गुणवत्तापूर्ण सामग्री हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। डिजिटल युग में हिंदी को केवल बोलचाल और साहित्य की भाषा तक सीमित रखने के बजाय ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और रोजगार की प्रभावी भाषा बनाने की आवश्यकता है।

वक्ताओं ने कहा कि हिंदी ने अब तक निश्चित रूप से उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन उसकी वास्तविक सफलता का आकलन केवल बोलने वालों की संख्या या व्यापक उपयोग से नहीं किया जा सकता। हिंदी को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संचार की भाषा बनाने की दिशा में अभी लंबा सफर तय करना बाकी है। नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने और डिजिटल दुनिया में हिंदी की मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।

अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. मृत्युंजय कुमार भट्ट ने कहा कि मातृभाषा में जो सहजता, आत्मीयता और आनंद मिलता है, वह किसी दूसरी भाषा में उसी रूप में संभव नहीं। उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रति सम्मान केवल हिंदी दिवस तक सीमित न रहे, बल्कि दैनिक जीवन, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार में भी हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन प्रो. डॉ. प्रदीप दुबे ने किया। अंत में उपस्थित साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों ने हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा उसे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास करने पर बल दिया।

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