जन्मभूमि को नेचर विलेज में बदलने की प्रेरक पहल

  • निर्भय प्रताप सिंह के प्रयास से टंड्वा गांव बना आत्मनिर्भर भारत का मॉडल

डेहरी-आन-सोन (रोहतास) उपेंद्र मिश्र । जब देश आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहा है, उसी समय रोहतास जिले का एक छोटा-सा गांव इस विचार को जमीन पर उतारता दिखाई दे रहा है। टंड्वा गांव में विकास का अर्थ अब केवल पक्की सड़क या बिजली तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा और संस्कार के संतुलन से जुड़ चुका है।

इस बदलाव के केंद्र में हैं टंड्वा गांव निवासी निर्भय प्रताप सिंह, जिन्होंने अपनी जन्मभूमि को नेचर विलेज के रूप में विकसित कर यह साबित किया है कि यदि गांव मजबूत होंगे, तभी राष्ट्र आत्मनिर्भर बनेगा।

स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले निर्भय प्रताप सिंह कहते हैं कि “जागो, उठो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए” को उन्होंने अपने जीवन का ध्येय वाक्य बनाया है। गांवों को प्रकृति की ओर लौटाने का उनका अभियान निरंतर आगे बढ़ रहा है।

इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त निर्भय प्रताप सिंह एक दूरदर्शी सामाजिक वास्तुकार के रूप में उभरे हैं। करियर की शुरुआत उन्होंने मर्चेंट नेवी से की, लेकिन सामाजिक सेवा की आंतरिक प्रेरणा ने उन्हें लोकसेवा की ओर मोड़ा।

बिहार लोक सेवा आयोग की 2021 सिविल सेवा परीक्षा में चयन के बाद उन्हें बिहार राजस्व सेवा आवंटित हुई। वर्ष 2023 में उन्होंने अपनी जन्मभूमि टंड्वा गांव को नेचर विलेज के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया और ग्रामीणों को इस अभियान से जोड़ा।

कर्मस्थली जमुई जिले के मटिया गांव को भी नेचर विलेज के रूप में विकसित करने की दिशा में उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया। अगस्त 2025 में उन्होंने सरकारी सेवा से त्यागपत्र देकर युवाओं को राष्ट्रवाद और आत्मनिर्भर भारत की ओर प्रेरित करने का मार्ग चुना।

निर्भय प्रताप सिंह बताते हैं कि वे छात्र जीवन से ही स्वामी विवेकानंद की जीवनी से प्रभावित रहे हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण कर उन्होंने कई प्रगतिशील गांवों का अध्ययन किया तथा अन्ना हजारे सहित पद्मश्री सम्मानित व्यक्तित्वों से विचार-विमर्श कर बदलाव की दिशा सीखी।

इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने अपने गांव को आत्मनिर्भर नेचर विलेज मॉडल के रूप में विकसित किया, जो नीचे से ऊपर की ओर कार्य करता है। 30 हजार से अधिक ग्रामीण परिवार इस पहल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं।

निर्भय प्रताप सिंह ने पांच हजार से अधिक ग्रामीणों, सरकारी व निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों को योग सत्रों के माध्यम से प्रशिक्षित किया है। इससे संपूर्ण स्वास्थ्य के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण की भावना का विकास हुआ है।

गांव की गलियां और मुख्य सड़कें स्वच्छता का संदेश देती हैं। सभी बच्चे नियमित विद्यालय जा रहे हैं और पूरा गांव स्ट्रीट लाइट से रोशन है। स्वच्छता और शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीणों को जागरूक कर सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया गया है।

नेचर विलेज टंड्वा में “आधा घंटा रोज करो योग” का मंत्र अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। ग्रामीण स्वस्थ, संतुलित और संवेदनशील जीवनशैली को अपना रहे हैं। योग के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विरासत का पुनर्जीवन हो रहा है।

गांव में स्वच्छताग्राही नाली, सड़क और गलियों की साफ-सफाई में सक्रिय हैं, जबकि शिक्षाग्राही ग्रामीण बच्चों और युवाओं को शिक्षा के महत्व के प्रति प्रेरित कर रहे हैं। सामूहिक रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हो रही है और पिछले तीन वर्षों में कई युवाओं को सरकारी नौकरी भी मिली है।

महिलाओं के समूह बनाकर पारंपरिक मसाला कुटीर उद्योग की स्थापना की गई। मशीन संचालन से लेकर विपणन तक का प्रशिक्षण दिया गया। इस कार्य से जुड़ी महिलाएं “नेचर दीदी” के नाम से जानी जाती हैं। इसके साथ ही महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण भी दिया गया, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकीं और कई परिवारों में आर्थिक समृद्धि आई है।

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