सुभाष चंद्र बोस: पीढ़ियों को प्रेरित करने वाली विरासत

–०आलेख०– सुभाष चंद्र बोस: पीढ़ियों को प्रेरित करने वाली विरासत
गजेंद्र सिंह शेखावत, केंद्रीय संस्कृति मंत्री

पराक्रम दिवस के अवसर पर, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 128वीं जयंती को रेखांकित करता है, हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके अपार योगदान और उनकी अदम्य भावना का सम्मान करते हैं, जो आज भी युवाओं को प्रेरित करती है। इस दूरदर्शी नेता के जीवन और आदर्शों का उत्सव मनाने के लिए स्थापित, पराक्रम दिवस इस बात पर विचार करने का एक अवसर है कि हम उनके सिद्धांतों को अपनी व्यक्तिगत और राष्ट्रीय आकांक्षाओं के साथ कैसे एकीकृत कर सकते हैं। यह दिन, न केवल उनके बलिदान की याद दिलाता है, बल्कि कार्रवाई का आह्वान भी करता है तथा हमें साहस, निष्ठा और नेतृत्व के उनके सिद्धांतों को अपनाने का आग्रह करता है, ताकि एक समृद्ध, आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण किया जा सके।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, नेताजी के योगदान को संस्थागत रूप दिया गया है तथा इसे पहले से कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर मनाया जा रहा है। 2021 में, सरकार ने 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में नामित किया, जिससे नेताजी की विरासत का सम्मान करने के लिए वार्षिक राष्ट्रव्यापी समारोह सुनिश्चित हुआ। कर्त्तव्य पथ पुनर्विकास परियोजना के तहत इंडिया गेट पर नेताजी की प्रतिमा का अनावरण, उनके विजन के प्रति एक ऐतिहासिक श्रद्धांजलि थी। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे “भारतीय गौरव और संस्कृति के पुनरुत्थान” का प्रतीक घोषित किया, जो बोस के राष्ट्रवाद के आदर्शों के अनुरूप है।
इसके अलावा, नेताजी से जुड़ी 304 फाइलों को सार्वजनिक करना एक ऐतिहासिक कदम था, जिसने दशकों से चल रही अटकलों को खत्म कर दिया और जनता को उनके जीवन और कार्य से जुड़े महत्वपूर्ण रिकॉर्ड तक पहुंच प्रदान की। इसके अतिरिक्त, मणिपुर के मोइरंग में आईएनए मेमोरियल का पुनरुद्धार, जहां इंडियन नेशनल आर्मी ने पहली बार तिरंगा फहराया था, नेताजी की विरासत को संरक्षित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने बोस के वैश्विक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “नेताजी का जीवन स्वतंत्रता के लिए समर्पित था और उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जो आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से भरा हो।”


सुभाष बोस का जन्म कटक में एक सम्मानित परिवार में हुआ था। वे एक प्रतिभाशाली छात्र थे। कटक के रेवेनशॉ कॉलेजिएट स्कूल, कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज और भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) परीक्षा में उन्होंने अपने अध्ययन का बेहतरीन प्रदर्शन किया। देशभक्ति की गहरी भावना और अपने देश की सेवा करने की इच्छा से प्रेरित होकर, उन्होंने एक सम्मानजनक करियर की सुख-सुविधाओं को ठुकराते हुए आईसीएस से इस्तीफा देने का फैसला किया। बाद में, उन्होंने देशभक्ति की भावना जगाने और देशवासियों के बीच स्वतंत्रता का संदेश फैलाने के लिए 1921 में ‘स्वराज’ नामक एक समाचार पत्र शुरू किया।
नेताजी का स्वतंत्र भारत का सपना सिर्फ़ एक सपना नहीं था, बल्कि कार्रवाई का आह्वान था। जब वे 1941 में नज़रबंदी से भाग निकले और अंतरराष्ट्रीय समर्थन मांगा, तो यह सिर्फ़ एक रणनीतिक कदम नहीं था – यह दृढ़ संकल्प, सहनशीलता और ज़रूरत पड़ने पर अपरंपरागत रास्ते अपनाने की इच्छाशक्ति का एक साहसिक दावा था।
उन्होंने घोषणा की, “मुझे खून दो और मैं तुम्हें आजादी दूंगा,” यह उनके इस विश्वास को दर्शाता है कि सच्ची आज़ादी के लिए सिर्फ़ शब्दों की नहीं, बल्कि कार्यों की भी जरूरत होती है। चाहे वह इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) के निर्माण के ज़रिए हो या आज़ाद हिंद रेडियो पर उनके भाषणों के ज़रिए, बोस ने दिखाया कि आज़ादी हासिल करने के लिए सामूहिक प्रयास, बलिदान और प्रगति के व्यापक दृष्टिकोण में योगदान देने की इच्छा की ज़रूरत होती है। पूर्व ब्रिटिश पीएम क्लेमेंट एटली ने एक बयान में अंग्रेजों के भारत छोड़ने के कई कारण बताए, “उनमें से सबसे प्रमुख कारण था – नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरूप भारतीय सेना और नौसेना कर्मियों के बीच ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी का कम होना।”
यद्यपि महात्मा गांधी के साथ उनके वैचारिक मतभेद जगजाहिर थे, लेकिन गांधी के सिद्धांतों के प्रति बोस का सम्मान अटल रहा और उनके विपरीत रास्ते उनके पृथक दृष्टिकोणों को उजागर करते थे। नेताजी ने 1939 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया, लेकिन भारत की स्वतंत्रता की उनकी प्रतिबद्धता कभी कम नहीं हुई। आज के युवाओं के लिए, यह हमें अपने आदर्शों के प्रति सच्चे रहने का महत्व सिखाता है, भले ही आगे का रास्ता चुनौतियों से भरा हो।
नेताजी ने आईएनए के भीतर “झांसी की रानी रेजिमेंट” का गठन करके “नारी शक्ति” के महत्व को मान्यता दी, एक पूरी तरह से महिला रेजिमेंट जिसने महिला सशक्तिकरण के प्रति उनके विश्वास को सुदृढ़ किया। ये आदर्श माननीय प्रधानमंत्री के भारत के विज़न मंर अच्छी तरह से परिलक्षित होते हैं, जहाँ महिलाएँ देश के भविष्य को आकार देने में एक अभिन्न भूमिका निभाती हैं।
पराक्रम दिवस, नेताजी की अमर विरासत का एक वार्षिक अनुस्मारक आयोजन बन गया है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रदर्शनियों से युक्त समारोहों के पिछले आयोजनों ने उनके योगदान को प्रतिष्ठा दी है, जिसमें कोलकाता और दिल्ली प्रमुख आयोजन स्थल हैं, जहाँ उनकी एकता और देशभक्ति की भावना सड़कों पर गूंजती थी। इस वर्ष, कटक में, इस कार्यक्रम का विशेष महत्व है, क्योंकि यह उनके मूल स्थान का सम्मान करता है।
एक ऐसी दुनिया में जो सुदृढ़ता और नवाचार की मांग करती है, उनकी जीवन गाथा युवाओं को एक विकसित भारत – एक आत्मनिर्भर, विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने और कार्य करने के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा के रूप में कार्य करती है। जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था, “सुभाष चंद्र बोस का नाम देशभक्ति की भावना जगाता है और राष्ट्र को साहस और निस्वार्थ भाव से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।”
आइए हम एक उज्ज्वल, मजबूत भविष्य के लिए मिलकर काम करके उनकी विरासत को आगे बढ़ाएं।


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