कृषि विज्ञान केंद्रों को किसानों की बदलती जरूरतों के अनुरूप कार्य करना होगा : डॉ. पाण्डेय

पटना। भा.कृ.अनु.प.-कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), क्षेत्र-IV, पटना का 11वां स्थापना दिवस समारोह हर्षोल्लास और गरिमापूर्ण वातावरण में आयोजित किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. पी. एस. पाण्डेय, कुलपति, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, समस्तीपुर रहे। कार्यक्रम में भा.कृ.अनु.प.-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना के निदेशक डॉ. अनूप दास, भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के निदेशक डॉ. बिकास दास, सहायक उप-महानिदेशक (कृषि विस्तार) डॉ. आर. आर. बर्मन, भा.कृ.अनु.प.-भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, रांची के निदेशक डॉ. सुजय रक्षित तथा बिहार पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय, पटना के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. निर्मल सिंह दहिया सहित कई गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।

समारोह में ऑनलाइन माध्यम से देश के सभी 10 अटारी के निदेशक, बिहार एवं झारखंड के कृषि विश्वविद्यालयों के प्रसार शिक्षा निदेशक तथा कृषि विज्ञान केंद्रों के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख भी जुड़े। इस दौरान कृषि विस्तार, तकनीकी हस्तांतरण और कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में अटारी, पटना के निदेशक डॉ. रंजय कुमार सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों की वर्तमान भूमिका, नवीन कृषि तकनीकों को कम समय में किसानों तक पहुंचाने, कृषि को बाजार से जोड़ने तथा बिहार एवं झारखंड के कृषि विज्ञान केंद्रों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने कहा कि कृषि विज्ञान केंद्रों को मूल्य संवर्धन, बाजारोन्मुखी कृषि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दस्तावेजों के डिजिटलीकरण, प्रतिपुष्टि तंत्र, व्यावसायिक मॉडल और कृषि उद्यमिता जैसे उभरते क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि किसानों की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप कृषि विज्ञान केंद्रों को अपनी कार्यप्रणाली को और प्रभावी बनाना होगा।

उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से बिहार और झारखंड के किसानों, महिलाओं तथा युवाओं को सशक्त करने के साथ कृषि क्षेत्र में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों के कार्यों के प्रभाव का नियमित आकलन एवं मूल्यांकन करने पर भी जोर दिया, ताकि किसानों की वास्तविक जरूरतों के अनुसार तकनीकों का प्रभावी हस्तांतरण हो सके।

लीची की खेती के विस्तार की संभावनाओं पर जोर

डॉ. बिकास दास ने बिहार में लीची की खेती की व्यापक संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भविष्य में राज्य में लीची की खेती के क्षेत्रफल में लगभग 20 लाख हेक्टेयर तक विस्तार की संभावना है। उन्होंने नवीन तकनीकों को समय पर किसानों तक पहुंचाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों से अपने प्रक्षेत्रों पर कम से कम 10-12 लीची के पौधे लगाने का अनुरोध किया, ताकि विभिन्न जिलों में लीची की खेती की संभावनाओं का व्यावहारिक आकलन किया जा सके।

समेकित कृषि प्रणाली अपनाने पर जोर

डॉ. अनूप दास ने बिहार और झारखंड के छोटे एवं सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के लिए समेकित कृषि प्रणाली को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि कृषि के साथ पशुपालन, बागवानी, मत्स्यपालन और अन्य कृषि आधारित गतिविधियों को जोड़कर अधिक टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि मॉडल विकसित किए जा सकते हैं।

बिहार पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. निर्मल सिंह दहिया ने कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से पशुपालन एवं पशुधन आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। उन्होंने तकनीकी सहयोग के लिए विश्वविद्यालय की ओर से हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया।

ऑनलाइन जुड़े डॉ. आर. आर. बर्मन ने तकनीकी हस्तांतरण, नवीन प्रौद्योगिकियों को अपनाने और बाजारोन्मुखी कृषि प्रसार को मजबूत करने पर जोर दिया। वहीं डॉ. सुजय रक्षित ने कृषि विज्ञान केंद्रों, भा.कृ.अनु.प. संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता बताई। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों तक सही समय पर सटीक एवं उपयोगी कृषि जानकारी पहुंचाने को आवश्यक बताया।

वार्षिक रिपोर्ट और हिंदी पत्रिका का विमोचन

समारोह में भा.कृ.अनु.प.-अटारी, पटना की वार्षिक रिपोर्ट-2025 का विमोचन किया गया। रिपोर्ट में संस्थान एवं इसके अधीन कृषि विज्ञान केंद्रों की प्रमुख गतिविधियों, उपलब्धियों और कृषि विस्तार पहलों का संकलन है। इसके साथ ही संस्थान की हिंदी पत्रिका ‘पूर्वी किरण’ का भी विमोचन किया गया, जिसमें पूर्वी भारत के किसानों एवं ग्रामीण समुदायों के लिए उपयोगी कृषि तकनीकों, प्रसार गतिविधियों और कृषक सफलता की कहानियों को शामिल किया गया है।

समारोह में संस्थान के वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों ने सक्रिय सहभागिता की। कार्यक्रम में कृषि विस्तार, नवीन तकनीकों के प्रसार, बाजारोन्मुखी कृषि, कृषि उद्यमिता, जलवायु अनुकूल कृषि और कृषि विज्ञान केंद्रों की भविष्य की भूमिका पर सार्थक चर्चा हुई। समारोह ने बिहार एवं झारखंड में कृषि अनुसंधान को किसानों की जरूरतों से जोड़ने तथा तकनीकी नवाचारों को खेत तक पहुंचाने के सामूहिक प्रयासों को मजबूत करने का संदेश दिया।


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