पूर्णिया में संतुलित उर्वरक उपयोग अभियान को लेकर उच्चस्तरीय बैठक, डीएपी के अत्यधिक उपयोग पर चिंता

पटना/ पूर्णिया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर) के पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना में बुधवार को पूर्णिया जिले में संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से संयुक्त समन्वय टीम की एक महत्वपूर्ण बैठक हाइब्रिड माध्यम से आयोजित की गई। बैठक का मुख्य फोकस पूर्णिया जिले में डीएपी उर्वरक के अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग की समस्या पर रहा, जिसे देश के शीर्ष 100 डीएपी उपभोग करने वाले जिलों में शामिल किया गया है।

बैठक की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने की, जबकि कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. अंजनी कुमार विशेष रूप से उपस्थित रहे। इस दौरान कृषि विज्ञान केंद्र पूर्णिया, जिला कृषि विभाग एवं भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

बैठक में विशेषज्ञों ने संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए कई अहम रणनीतियों पर चर्चा की, जिनमें समेकित पोषक तत्व प्रबंधन , हरी खाद का प्रयोग, ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती तथा जैव उर्वरकों का उपयोग शामिल है। किसानों की क्षमता वृद्धि के लिए प्रशिक्षण एवं कार्यशालाओं के आयोजन का निर्णय लिया गया, जिसके तहत 100 हरी खाद/दलहनी फसलों तथा 100 जैव उर्वरक आधारित प्रत्यक्षण आयोजित किए जाएंगे।

विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि अब पारंपरिक “एक जैसी उर्वरक सिफारिश” की पद्धति को छोड़कर मृदा परीक्षण आधारित एवं स्थान-विशिष्ट उर्वरक प्रबंधन अपनाना जरूरी है, ताकि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग हो सके।

इसके अलावा, नैनो उर्वरक एवं तरल पोषक तत्व जैसे आधुनिक विकल्पों को अपनाने पर भी जोर दिया गया, जिससे डीएपी पर निर्भरता कम की जा सके। डॉ. अनुप दास ने अपने संबोधन में कहा कि उर्वरकों का युक्तिसंगत उपयोग किसानों की लागत घटाने के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

बैठक में यह भी सामने आया कि पूर्णिया में फसल पैटर्न में बदलाव—विशेषकर गेहूं से मक्का एवं मखाना की ओर—को देखते हुए फसल-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन अनुसूचियों के पुनरीक्षण की आवश्यकता है। साथ ही, मखाना की जलीय खेती के संदर्भ में वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन विकसित करने पर बल दिया गया, ताकि जल गुणवत्ता सुरक्षित रह सके।

अंततः, यह निर्णय लिया गया कि अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन, किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं व्यापक जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग के लाभों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा। सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति जताई कि अनुसंधान संस्थानों, प्रसार एजेंसियों एवं संबंधित विभागों के बीच समन्वित कार्ययोजना के जरिए इस अभियान को प्रभावी बनाया जाएगा।

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