नाट्य प्रतियोगिता के दूसरे दिन सामाजिक यथार्थ, कर्म और अहिंसा के रंग में रंगा मंच

डेहरी-आन-सोन (रोहतास)- निशांत राज। अभिनव कला संगम के तत्वावधान में आयोजित 34वीं अखिल भारतीय लघु नाट्य एवं सांस्कृतिक प्रतियोगिता के दूसरे दिन रंगमंच सामाजिक चेतना, ऐतिहासिक संदर्भों और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत केंद्र बना रहा। देश के विभिन्न राज्यों से आई रंगमंडलियों ने अपने सशक्त अभिनय, प्रभावी संवाद और सजीव मंच-सज्जा के माध्यम से दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। प्रस्तुत नाटकों में कर्म-दर्शन, किसान जीवन की पीड़ा, सत्ता संघर्ष, गांधीवादी अहिंसा, सांप्रदायिक सौहार्द और भारत की अनेकता में एकता जैसे विषय प्रमुखता से उभरे।


दिन के सत्र में अभिनव कला संगम के तत्वावधान में ई. ललन सिंह स्पोर्टिंग क्लब परिसर में पेंटिंग, रंगोली एवं मेहंदी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें शहर के विभिन्न विद्यालयों की छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिता के दौरान छात्राओं ने रंगों और रचनात्मकता के माध्यम से सामाजिक विषयों, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय एकता को प्रभावशाली ढंग से उकेरा। प्रतिभागियों की कलात्मक अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास ने दर्शकों व निर्णायकों को विशेष रूप से प्रभावित किया।

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शाम के सत्र की शुरुआत अनुभूति सेवा समिति, शाहजहाँपुर द्वारा प्रस्तुत नाटक “कर्ण जीत गया केशव” से हुई। महाभारत के महान पात्र कर्ण के अंतर्मन के द्वंद्व को केंद्र में रखकर रचित इस नाटक में उस एक रात्रि का चित्रण किया गया, जब द्रोणाचार्य की मृत्यु के बाद कर्ण को कौरव सेना का सेनापति बनाया जाता है और अगले दिन अर्जुन से उसका निर्णायक युद्ध होना है। इसी दौरान पांडव होने का सत्य जानकर कर्ण पुत्र-धर्म और कर्म-धर्म के बीच उलझ जाता है। श्रीकृष्ण द्वारा गीता के कर्म-संदेश को समेटे यह प्रस्तुति कर्तव्य और नैतिकता की महत्ता को रेखांकित करती है।
इसके बाद साईं आर्ट एवं कल्चर सोसाइटी, जमशेदपुर (झारखंड) ने प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास गोदान पर आधारित नाटक “होरी” प्रस्तुत किया। एक गरीब किसान होरी के जीवन संघर्ष, शोषण, कर्ज और सामाजिक बंधनों की पीड़ा को मार्मिक ढंग से दर्शाते हुए नाटक ने दर्शकों को भावुक कर दिया। अंततः होरी की मृत्यु भारतीय किसान की बदहाल स्थिति को उजागर करती है।
पंथोइबी (हाओरेइबी), मणिपुर की प्रस्तुति “खुमान कंगला वायत चेई” ने मंच पर ऐतिहासिक-राजनीतिक संघर्षों को जीवंत किया। नाटक में सेनापति चिंगलेनखोम्बा की निष्ठा, राज्य-कल्याण के लिए किए गए त्याग और सत्ता की लालसा में रची गई साजिशों का प्रभावशाली चित्रण किया गया। पारिवारिक ईर्ष्या और गलत संदेशों के कारण एक सच्चे सेनापति का पतन दर्शकों को सोचने पर विवश करता है।


वहीं गगनिका सांस्कृतिक समिति, शाहजहाँपुर द्वारा प्रस्तुत नाटक “हमारे बापू” ने गांधीवादी विचारधारा, अहिंसा और सांप्रदायिक सौहार्द का सशक्त संदेश दिया। नाटक में दर्शाया गया कि कैसे गांधी जी की सीख मानवता और प्रेम को हिंसा से ऊपर रखती है, जो आज के सामाजिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है।
आईना कला साहित्य, गिरिडीह की एकांकी “आशियाना: एक छोटा भारत” ने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से देश की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को मंच पर उतारा। आपसी नोकझोंक के बावजूद संकट के समय एकजुटता का संदेश देते हुए नाटक ने भारत की अनेकता में एकता की भावना को सशक्त रूप से प्रस्तुत किया।
इसके अतिरिक्त बिंग एंटरटेनमेंट फिल्म द्वारा प्रस्तुत नाटक “श्मशान महापर्व” तथा संदेश सांस्कृतिक संस्था, फिरोजाबाद की प्रस्तुति “पंछी” ने भी मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई। दूसरे दिन की सभी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को विचार, संवेदना और मनोरंजन—तीनों स्तरों पर समृद्ध किया।

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